श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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निर्मल आत्मा की नहीं होती अपितु अज्ञान कलुषित होती है । इसलिए अज्ञान के साथ उसका कोई विरोध नहीं है । (उत्तर) बहुत अच्छे; यदि ऐसी ही बात है, तो ज्ञान का प्रागभाव अज्ञान, विशुद्ध आत्म स्वरूप विषयक होगा, तथा आश्रय और विषय रूप से होने वाला आत्मज्ञान, विशुद्ध आत्म विषयक न होगा, इसलिए उक्त प्रकार के आत्मज्ञान की स्थिति में भी प्रागभाव रूपी अज्ञान बना रहेगा । आपके इस कथन में तो सिवा अज्ञान भाव सिद्धि की चेष्टा के, कोई और विशेष बात समझ में नहीं आती, अज्ञान को यदि भावस्वरूप मान भी ले, तब भी वह कहलायेगा तो अज्ञान ही, प्रागभाव की तरह, उसमें भी पूर्वोक्त सापेक्षता तो रहेगी ही । जरा सोचिये—अज्ञान है क्या वस्तु ? क्या वह ज्ञान का अभाव है, या ज्ञान विरोधी अज्ञान है, या ज्ञान से भिन्न कोई वस्तु विशेष है ? इन तीनों की जानकारी के पहिले ज्ञान के स्वरूप की जानकारी आवश्यक है । यद्यपि अन्धकार के स्वरूप की प्रतीति में प्रकाश ज्ञान की अपेक्षा नहीं रहती, फिर भी अन्धकार को जब प्रकाश के विरोधी रूप में जानने की इच्छा होती है तब प्रकाश की प्रतीति की अपेक्षा होती है । आपका अभिप्रेत “अज्ञान ” कभी भी स्वरूप से तो प्रतीत होता नहीं, केवल “अज्ञान” इस नाम से ही ज्ञात होता है इस प्रकार ज्ञानाभाव की तरह सापेक्षता इसमे भी रहती है इसलिए ज्ञान का प्रागभाव तो आप भी मानते है ऐसा लगता है । “मैं अज्ञ” इत्यादि प्रतीति में उभय संमत प्राग्- भाव स्वीकारना ही संगत है । नित्यमुक्तस्वप्रकाश चैतन्यैकस्वरूपस्यब्रह्मणोऽज्ञानानुभवश्च न संभवति स्वानुभवस्वरूपत्वात् । स्वानुभवस्वरूपमपि तिरोहितस्व- रूपमज्ञानमनुभवतीति चेत्, किमिदं तिरोहित स्वरूपत्वम् ? अप्रकाशितस्वरूपत्वमिति चेत् , स्वानुभवस्वरूपस्य कथम् प्रकाशित स्वरूपत्वम् ? स्वानुभवस्वरूपस्याप्यन्यतोऽप्रकाशित स्वरूपमापद्यत इति चेत् , एवं तर्हि प्रकाशाख्यधर्मानभ्युपगमेन प्रकाशस्यैव स्वरूप- त्वादन्धतः स्वरूपनाश एव स्यात् इति पूर्वमेवमोक्तम् ।