श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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श्यामता उसी के उदाहरण हैं। इसी प्रकार एक ही अग्नि में भी तीन रूप देखें जाते है। श्रुति ने बतलाया है, कि सारे भूत सभी में मिश्रित है। विष्णु पुराण के सृष्टि प्रकरण मे भी बतलाया गया कि विभिन्न शक्ति वाले भूत बिना एक साथ मिले प्रजा की सृष्टि करने मे असमर्थ है। सारे ही भूत परस्पर मिलकर एक दूसरे के आश्रय से, महत्तत्व से लेकर अंतिम स्थूल ब्रह्माण्ड तक की सृष्टि करते है। “त्र्यात्मकत्वात्तु भूयस्त्वाद्” सूत्र में सूत्रकार भी इसी तथ्य की पुष्टि करते हैं। वेदों में सोमलता के अभाव में पुतीक ग्रहण का विधान बतलाया गया है, मीमांसको का मत है कि, पुतीक में सोमलता अंश विद्यमान है इसीलिए उसके ग्रहण का विधान है। इसी प्रकार व्रीहि के अभाव में, व्रीहि अंश युक्त नीवार के ग्रहण का विधान है। शुक्ति आदि पदार्थ मे जो रजत आदि का भ्रम होता है, वह भी रजतांश के सद्भाव के कारण ही है, यह श्रुतिसम्मत विचार है। बाहुल्य के कारण रजत की, शुक्ति से पृथक प्रतीति होती है। शुक्ति में जो रजत की सदृशता दीखती है, उससे ही शुक्ति मे रजतांश का सद्भाव निश्चित होता है। कभी चक्षु इन्द्रिय के दोष के कारण शुक्ति का शुक्तिभाव तिरोहित हो जाता है, चक्षु केवल रजतांश को ग्रहण करते है, जिसके फलस्वरूप हम उस वस्तु को प्राप्त करने के लिए उद्यत होते हैं। उक्त दृष्टि दोष के नष्ट हो जाने पर शुक्ति का शुक्तित्व सुस्पष्ट परिलक्षित होने लगता है, तब हताश होकर लौट आते है। इस प्रकार रजत की होने वाली प्रतीति यथार्थ ही है, केवल शुक्ति अंश के आधिक्य के कारण बाध्य बाधक व्यवस्था होती है। जब शुक्ति के लघु अंश रजतभाव का ग्रहण होता है उसे ही भ्रम कहना चाहिए, जब उसके बहुलांश का ग्रहण होता है, उसे सत्य कहते है, प्रथम ज्ञान बाध्य और द्वितीय ज्ञान बाधक है। मिथ्या या असत्य की प्रतीति से बाध्य बाधक भाव होता हो सो बात नहीं है। हर वस्तु हर में मिश्रित है ऐसी व्यवहार की व्यवस्था करना समीचीन है। स्वप्ने च प्राणिनां पुण्यपापानुगुणं भगवतैव तत्तत्पुरुषमात्रा- नुभाव्याः तत्तत्कालावसानाः तथाभूताश्चार्थाः सृज्यन्ते तथा हि श्रुति स्वप्न विषय “न तत्र रथाःन रथयोगाः न पंथानो भवंति, ankurnagpal108@gmail.com