भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( १५७ ) विरोधी क्षेत्रज्ञानां कर्मैवेति प्रतिपादनात् अस्तिनास्तिसत्यासत्यं शब्दानां च सदसदनिर्वचनीयवस्त्वभिधानासामर्थ्याच्च नास्त्यसत्य शब्दावस्तिसत्यशब्द विरोधिनौ। अतश्च ताभ्यां असत्वं हि प्रतीयते, नानिर्वचनीयत्वम् । उक्त प्रसंग में एक भी ऐसा पद नहीं है, जिससे परब्रह्म का निर्विशेष रूप, उसमें सदसदनिर्वचनीय अज्ञान की सत्ता जगत की मिथ्यात्व आदि की कल्पना की गई हो, अपितु इसमें तो स्पष्ट कहा गया कि-अस्ति-नास्ति शब्दों से प्रतिपादित जडचेतन सारा जगत, परात्पर परमेश्वर ब्रह्म विष्णु का शरीर एवं स्वरूप है। ज्ञान स्वरूप आत्मा की देव मनुष्य आदि आकारों की प्रतीति और अचित् परिणाम भी, वस्तु के यथार्थ ज्ञान के विरोधी, जीव के शुभाशुभ कर्म ही हैं। अस्ति-नास्ति, सत्य-असत्य आदि शब्दों में भी सद्-असद् अनिर्वचनीय वस्तु के बोधन का सामर्थ्य नहीं है। नास्ति और असत्य शब्द केवल, अस्ति और सत्य शब्दों का विरुद्धार्थ मात्र प्रकाशन करते हैं। इन दो शब्दों से असत्ता मात्र प्रतीत होती है, अनिर्वचनीयता नहीं । अत्र चाचिद्वस्तुनि नास्त्यसत्यशब्दौ न तुच्छत्वमिथ्यात्वपरौ प्रयुक्तौ, अपितु विनाशित्वपरौ। “वस्त्वस्ति किम्” महीघटत्वम् “इत्यत्रापि विनाशित्वमेव हि उपपादितम्, न निष्प्रमाणकत्वम्, ज्ञानवाध्यत्वंवा। एकेनाकारेणैकस्मिन् कालेऽनुभूतस्य कालान्तरे- परिणामविशेषेणान्यथोपलब्ध्वा नास्ति त्वोपपादनात् । तुच्छत्वं हि प्रमाणसंबंधानर्हत्वम् । बाधोऽपि यद्देशकालादिसंबंधितया नास्तीत्युपलब्धिः, न तु कालान्तरे, श्रनुभूतस्य कालान्तरे परि- णामादिना नास्तित्युपलब्धिः कालभेदेन विरोधाभावात् । अतो न मिथ्यात्वम् । इस प्रसंग में, अचिद् वस्तु के लिए प्रयुक्त नास्ति और असत्य शब्द तुच्छता और मिथ्यात्व के द्योतक नहीं है अपितु विनाशिता के वाचक हैं। “वस्त्वस्ति किम्’-मही घटत्वम् वाक्य भी, जड पदार्थ की ध्वंशशीलता के ही प्रतिपादक हैं। निष्प्रमाणकता या ज्ञान वाध्यता के नहीं। ankurnagpal108@gmail.com