श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १६० ) तरह स्वप्रकाश, अज्ञानान्धकार से अतीत उस महान् पुरुष को जानकर यहीं अमरता मिलती है, उसके पास पहुँचने का कोई दूसरा मार्ग नहीं है"—"विद्युत के समान प्रकाशमान उस पुरुष से समस्त निमेष उत्पन्न हुए हैं” उसका शासक कोई नहीं है, उसका नाम ही महान यश है— “जो इसे जानता है, वह मुक्त हो जाता है।” इत्यादि अनेक श्रुतियों में निर्विशेष के विपरीत वर्णन मिलता है। परब्रह्म को सविशेष मानकर ही समस्त वाक्य सविशेष ब्रह्म ज्ञान से मोक्ष बतलाते हैं। जीव के अज्ञान को दूर करने वाले शोधक ( सत्यं ज्ञानमनंतं ब्रह्म आदि ) वाक्य भी सविशेष ब्रह्म का ही प्रतिपादन करते हैं, ऐसा पहिले भी कह चुके हैं। तत्त्वमस्यादि वाक्येषु सामानाधिकरण्यं न निर्विशेषवस्त्वैक्य- परम्, तत्त्वंपदयोः सविशेषब्रह्माभिधायित्वात्। तत्पदंहि सर्वज्ञं सत्य संकल्पं जगत् कारणं ब्रह्म परामृशति—"तदैक्षत् बहुस्याम्" इत्यांदिषु तस्यैव प्रकृतत्वात्। तत् सामानाधिकरएं त्वं पदं च अचिद्विशिष्टजीवशरीरकंब्रह्म प्रतिपाद्यति, प्रकारद्वयाव- स्थितैकवस्तुपरत्वात् सामानाधिकरण्यस्य । प्रकारद्वय परित्यागे प्रवृत्ति निवृत्त भेदासंभवेन सामानाधिकरण्यमेव परित्यक्तं स्यात्, द्वयोः पदयोः लक्षणा च । “