भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( १६२ ) एक विशेषता यह होगी कि-“यह रजत नही है” इस बाध्य प्रतीति की तरह तत् त्वं पदों मे किसी प्रकार की बाधा न होते हुए भी (अपने मत के प्रतिपादन के लिए) जबरन बाधा की परिकल्पना करनी पड़ेगी । तत् पद से जिस चैतन्याधिष्ठान की प्रतीति होती है, उसमें उससे भिन्न धर्म की उपस्थापना करने से बाधा उत्पन्न भी नही होती । यदि कहो कि-चैतन्याधिष्ठान के प्रथम अज्ञान तिरोहित रहता है, बाद मे तत् पद से वह प्रकट हो जाता है; सो ऐसा नही है, बाधा के पूर्व यदि अधिष्ठान प्रकाशित न रहेगा तो, आधार रहित भ्रम और बाधा दोनों हो नही सकते । यदि कहो कि भ्रमाश्रय अधिष्ठान अतिरोहित रहता है (केवल बाधा का आश्रय ही आवृत रहता है) सो भी असंभव है, जब अधिष्ठान का स्वरूप ही भ्रम का विरोधी है तो वह अधिष्ठान के प्रकाशित स्वरूप के समक्ष टिक भी कैसे सकता है । इससे सिद्ध होता है, कि भ्रम और बाधा अधिष्ठान आश्रित नही हो सकते । उक्त वाक्य में अधिष्ठान के अतिरिक्त किसी पारमार्थिक धर्म और उस धर्म के तिरोधान को माने बिना भ्रम और बाधा का उपपादन करना सहज नही है । पुरुष आकार वाले अधिष्ठान से भिन्न वास्तविक राजत्व के छिपे रहने पर ही बाध्यत्व भ्रम होता है। राजत्व के उपदेश से ही उस भ्रम की निवृत्ति होती है। केवल अधिष्ठान मात्र के उपदेश से नही होती क्योंकि-अधिष्ठान तो प्रकाशित रहता ही है, उसके उपदेश की अपेक्षा ही क्या' है उससे भ्रम की निवृत्ति हो भी नही सकती । जीवशरीर जगत्कारण ब्रह्मपरत्वे मुख्यवृत्तं पदद्वयं, प्रकार द्वयविशिष्टैकवस्तुप्रतिपादनेन सामानाधिकरण्य च सिद्धम् । निरस्त निखिलदोषस्यसमस्तकल्याणगुणात्मकस्य ब्रह्मणो जीवान्तर्यामित्व- मप्यैश्वर्यमपरं प्रतिपादितं भवति । उपक्रमानुकूलता च । एक- विज्ञानेन सर्वविज्ञानप्रतिज्ञोपपत्तिश्च, सूक्ष्मचिद्वस्तुशरीरस्यैव ब्रह्मणः स्थूलचिदचिद्वस्तुशरीरत्वेन कार्यत्वात् “तमीश्वराणां परममहेश्वरम्” पराऽस्य शक्तिर्विविधैव श्रूयतो” अपहत पाप्मा... सत्यकामसत्यसंकल्पः” इत्यादि श्रुत्यंतरा विरोधश्च । ankurnagpal108@gmail.com