श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४ ४. हेयता वचन के अभाव हेतुक प्रधान को सत्-शब्द प्रतिपादकता का निराकरण। प्रधान की सत् शब्द वाच्यता के समर्थन में प्रतिज्ञा विरोध का निर्देश। जीव की सुषुप्तावस्था में प्राप्त सत् स्वरूपता के आधार पर, प्रधान के लिए प्रयुक्त सत् शब्दकता का खण्डन। ५. समस्त वेदांत वाक्यों की ब्रह्मकारणावगति के आधार पर प्रधान की जगत्कारणता का निराकरण एवं ब्रह्म की जगत् कारणता का प्रतिपादन। सत्य संकल्प आदि श्रुति के आधार पर सगुणब्रह्म की जगत्कारणता का उपपादन तथा निर्विशेष चिन्मात्र ब्रह्मवाद का खण्डन। —पृ० २६२-३०६ ६ आनन्दमयाधिकरण (सूत्र १३-२०) १. अधिकरण की भूमिका। २. वेदांत वाक्योक्त "आनन्दमय" शब्दार्थ के सम्बन्ध में संशय एवं उसकी जीवार्थता की कल्पना, शाखाचन्द्र आदि दृष्टान्त से आनन्दमय के जीवत्व का प्रतिपादन। शंकर सम्मत 'पुच्छ ब्रह्म' श्रुति पर विचार। ३. [सिद्धान्त]—आनन्दमय की परब्रह्मता का निरू- पण तथा उसके जीवत्व पक्ष का निरसन। परब्रह्म के जीवभाव और जगत्कारणभाव के मिथ्यात्व का निराकरण। तत्त्वमसि आदि वाक्यों में लक्षणा तथा उनके औपलक्ष्य सामानाधिकरण्य पर विचार, प्रासंगिक रूप से जैमिनीय “अरुणाधि- करणन्याय” से सूत्र का उपसंहार। ४. मयट् प्रत्यय के विकारार्थ का निराकरण तथा प्राचु- र्यार्थ का समर्थन। आनन्द हेतुता से परमात्मा की आनन्दमयता तथा मांत्रवर्णिक हेतुता से आनन्दमय की परमात्मकता का समर्थन। ankurnagpal108@gmail.com