श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २०६ ) प्रतिषिध्य “सत्यकामः संकल्पः” इति कल्याणगुणान्विदधती इयं श्रुतिरेवान्यत्र सामान्येनावगतम् गुण निषेधं हेयगुण विषयं व्यवस्था- पयति। हेयगुणों के अभाव से, परब्रह्म को निर्गुण बतलाने वाले वाक्यों का भी समाधान हो जाता है। “वह निष्पाप, जरा, मृत्यु, भूख प्यास रहित है” इत्यादि हेयगुणों का प्रतिषेध करके “वह सत्यकाम सत्यसंकल्प है” इत्यादि कल्याण गुणों की प्रकाशिका यह श्रुति ही विज्ञापन करती है कि—अन्यत्र जो सामान्य रूप से ब्रह्म के गुणों का निषेध किया गया है, वह हेय गुणों का ही है, गुणमात्र का नहीं है। ज्ञानस्वरूपं ब्रह्मेतिवादश्च सर्वज्ञस्य सर्वशक्तेर्निखिलहेयप्रत्यनीक कल्याणगुणाकरस्य ब्रह्मणः स्वरूपं ज्ञानैकनिरूपणीयं स्वयंप्रकाशतया ज्ञानस्वरूपं चेत्यभ्युपगमादुपपन्नतरः। “यःसर्वज्ञः सर्ववित्”, “परास्यशक्तिर्विविधैवश्रूयतेस्वाभाविकीज्ञानबलक्रिया च”, “विज्ञातारमरे केन विजानीयात् इत्यादिकाः ज्ञातृत्वमावेदयन्ति। “सत्यं ज्ञानं” इत्यादिकाश्च ज्ञानैकनिरूपणीयता स्वप्रकाशतया च ज्ञान स्वरूपताम्। जो श्रुतियां भगवान को ज्ञान स्वरूप बतलाती हैं उनका भी तात्पर्य यह है कि-ब्रह्म स्वभावतः सर्वज्ञ, सर्वशक्ति और मंगलमय गुणों के आश्रय हैं; ज्ञान के अतिरिक्त किसी अन्य रूप से उनके स्वरूप का निर्देश नहीं किया जा सकता, ज्ञान की तरह वह स्वयं प्रकाश हैं, इसीलिए उन्हें ज्ञान स्वरूप कहा गया है। “जो सर्वज्ञ और सर्वविद् हैं—” “उनकी स्वाभाविकी पराशक्ति, ज्ञान, बल क्रिया आदि अनेक नामों वाली हैं”—“अरे! उस विज्ञाता को कौन जान सकता है इत्यादि श्रुतियां परमात्मा की ज्ञातृता का वर्णन करती हैं। “सत्यंज्ञानं” आदि श्रुति, ज्ञानैकगम्यता और स्वप्रकाशता के आधार पर उनकी ज्ञान स्वरूपता को बतलाती है। ankurnagpal108@gmail.com