भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( २१८ ) फलाल्पास्थिरत्व ब्रह्मज्ञान फलानंतस्थिर-त्वज्ञान हेतुको ब्रह्मविचारा- रम्भो न युक्तः—इति । सूत्रार्थ योजनारम्भः—पूर्व पक्षवादी कर्म मीमांसकों की मान्यता है कि-वृद्ध व्यवहार (प्राचीनों के शब्द प्रयोग से) रहित शब्द की अव- बोधन शक्ति का अवधारण संभव नहीं है (अर्थात् किस शब्द का क्या अर्थ है, यह नहीं जाना जा सकता) वृद्ध व्यवहार कार्य बुद्धि (क्रियानु- ष्ठान दृष्टि) के विना हो नहीं सकता । कार्य रूप में ही शब्द की प्रामाणिकता है (वस्तुबोधन में शब्द की प्रामाणिकता नहीं है) अतः यज्ञादि कर्मानुष्ठान का प्रतिपादन ही वेद का मुख्यार्थ स्वीकारना होगा । स्वतः सिद्ध परब्रह्म के प्रतिपादक वेदांत वाक्यों का प्रामाण्य नहीं माना जा सकता । और न केवल पुत्रजन्मादि बोधक (पुत्रस्तेजातः इत्यादि) हर्षोत्पादक वाक्यों की तरह ब्रह्म बोधक वेदांत वाक्यों की प्रामाणिकता हो सकती है । त्रिकालवती हर्षोत्पादक अनंत और असंख्य कारणों में विशेष शुभ लग्न शुभ प्रसव आदि हर्ष की संभावना तथा प्रिय संगठन सूचक वक्ता के हर्षोल्लासपूर्ण मुख आदि को देखकर निश्चित किया जाता है कि—कोई विशेष प्रसंग उपस्थित है [केवल कथनमात्र से पुत्रजन्म की बात प्रामाणिक नहीं मानी जाती] अव्युत्पन्न (यौगिक अर्थ रहित) शब्द की विभक्ति के अर्थ निर्धारण में, निकटस्थ दूसरे पद के अर्थ से अथवा प्रकृति शब्द के अर्थ से, शब्द की सिद्ध वस्तुता की अभिधा शक्ति का निश्चय होता है । पर उक्त प्रसंग में वह नियम भी लागू न होगा, क्यों कि-यहाँ प्रसिद्ध कार्य बोधक सारे शब्द अंशविशेष (विभक्ति) से ही अर्थ निश्चय करा देते हैं । और न, सर्प से भयभीत व्यक्ति को “यह सर्प नहीं रस्सी है” इतना कहने मात्र से निर्भय देखा जाता है, केवल कहने से, सर्प के प्रति अभाव बुद्धि नहीं हो सकती जिससे कि भीत व्यक्ति सर्पा- भाव का निश्चय कर सके । निश्चेष्ट, निर्विष, अचेतन आदि अनेक भय निवृत्ति कारक कारणों से यह निश्चय नहीं हो पाता कि यथार्थ क्या है (यदि सर्प है तो निश्चेष्ट क्यों है ? संभवतः चुपचाप पड़ा हो, छूने से काट लेगा तो विष चढ़ जायगा इत्यादि भ्रांतियाँ, रस्सी बतलाने पर भी बनी रहती हैं) ankurnagpal108@gmail.com