श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
पृष्ठ 28, कुल 696 में से
संदर्भ में पढ़ें१६ आदि गायत्री के चार रूपों का निरूपण तथा गायत्री का ब्रह्म के रूप में उपपादन । सप्तमी एवं पंचमी विभक्ति से निर्दिष्ट ज्योति शब्द की अग्राह्यार्थता का निरास । —पृ० ३७१-७६ ११. ऐन्द्रप्राणाधिकरण (सूत्र २८-३२) १. ऐन्द्र प्रोक्त “प्राण” शब्द की जीवादि अर्थ में शंका तथा परमात्मार्थ रूप से उसका समाधान । २ जीवार्थ रूप से पुनः शंका तथा प्राण की अध्यात्म उपदेश के रूप से बहुल चर्चा होने से उसकी ब्रह्म रूपता का सुदृढ़ उपपादन । ३. शास्त्रलब्ध ज्ञान के अनुसार ऐन्द्र कृत उपदेश की परमात्मपरता का समर्थन । प्राण शब्द की मुख्य प्राणार्थ रूप से की गई शंका का सतर्क समाधान ।—पृ० ३७६-८५ (द्वितीय पाद) विषय, भूमिका, प्रथम पाद से संबंध, प्रथम पाद के विषय का संक्षिप्त विवरण, द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ पादों के वक्तव्य विषयों की पूर्व पीठिका। —पृ० ३८५-८६ १ प्रसिद्ध्याधिकरण (सूत्र १-८) १. पूर्वपक्ष—श्रुत्युक्त मनोमयादि विशिष्ट पदार्थ की जीवता तथा ब्रह्म शब्द की जीवार्थता का समर्थन । २. (सिद्धान्त)—मनोमयादि शब्द और ब्रह्म शब्द की परब्रह्मार्थता का निरूपण । मनोमयादि वाक्योक्त गुणराशि का ब्रह्म संबंधी उपपादन । जीव कर्तृं ता और कर्मता का विरोध, ब्रह्म संबंधी अनुकूल शब्द विशेष तथा स्मृति प्रमाणों का प्रदर्शन । हृदय में ब्रह्म की स्थिति का प्रतिपादन तथा हृदयस्थ ब्रह्म की संभाव्य भोग प्रसक्ति का प्रत्याख्यान । —पृ० ३८६-४०५ २. अत्ताधिकरण (सूत्र ९-१२) १. ब्राह्मण आदि समस्त की जीवता का समर्थन, सर्व- भोक्ता हेतुक उनकी ब्रह्मता का प्रतिपादन । ankurnagpal108@gmail.com