श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
पृष्ठ 292, कुल 696 में से
संदर्भ में पढ़ें( २३२ ) यथाप्रसिद्धि जन्मादिकारणमनूद्यते । प्रसिद्धिश्च-“सदेवसोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्”-तदैक्षत बहुस्यां प्रजायेयेति तत्तेजोऽसृजत् इत्येकस्यैव सच्छब्दवाच्यस्य निमित्तोपादानरूपकारणत्वेन तदपि- “सदेवेदमग्र एकमेवासीत्” इत्युपादानतां प्रतिपाद्य “अद्वितीयम्” इत्याधिष्ठात्रन्तरं प्रतिषिध्य “तदैक्षत बहुस्यां प्रजायेयेति तत्तेजोऽसृजत्” इत्येकस्यैव प्रतिपादनात् । तस्माद् यन्मूला जगज्जन्मस्थितिलयाः तद्ब्रह्मेति जन्मस्थितिलयाः स्वनिमित्तोपादानभूतं वस्तुब्रह्मेति लक्षयन्ति । जगन्निमित्तोपादानताक्षिप्तसर्वज्ञत्वसत्यसंकल्पत्वविचि- त्रशक्तित्वाद्याकारबृहत्त्वेनप्रतिपन्नं ब्रह्मेति च जन्मादीनां तथा प्रतिपन्नस्य लक्षणत्वेन नाकारान्तराप्रतिपत्तिरूपानुपपत्तिः । जगत सृष्टि-स्थिति-प्रलय से उपलक्षित ब्रह्म का प्रतिपादन किया जा सकता है । यह कहना भूल है कि-उपलक्षण और औपलक्ष्य इन दोनों के आकार से भिन्न किसी प्रकार की प्रतीति के बिना ब्रह्म की स्वरूप प्रतीति नहीं हो सकती । औपलक्ष्य (ब्रह्म) सीमा रहित, अतिबृहन् और बृहंण अर्थात् जगद् वृद्धि का हेतु है, “बृह” धातु का यही शब्दार्थ होता है । जगत् का जन्म-स्थिति और लय उसके ही उपलक्षण स्वरूप (परिचायक) हैं । यतः येन और यत् ये तीनों पद, जन्मादि आदि का प्रसिद्ध की तरह निर्देश करते हैं, ये लोक प्रसिद्ध जन्मादि कारण के अनु- वादक मात्र हैं । “हे सोम्य ! यह जगत् सृष्टि के पूर्व एक अद्वितीय सत् ही था, उन्होंने विचार किया कि मैं बहुत होकर जन्म लूं , उन्होंने तेज की सृष्टि की” इस श्रुति में “सत्” पद वाच्य एक ही ब्रह्म की निमित्त और उपादान कारणता सुस्पष्ट है । “यह जगत पहले एक सत् स्वरूप था” इससे ब्रह्म की उपादान कारणता का प्रतिपादन करके “अद्वितीय” पद से अन्य अधिष्ठाता (निमित्त कारण) का निषेध करके “उन्होंने विचार किया बहुत होकर जन्म लूं और फिर तेज की सृष्टि की” इस वाक्य में एक ही ब्रह्म की उपादान और निमित्त कारणता का प्रतिपादन किया गया है, इससे उक्त तथ्य की पुष्टि होती है । इससे ज्ञात होता है कि-जगत् की सृष्टि-स्थिति और लय का मूल ब्रह्म ही है । उक्त वाक्य ankurnagpal108@gmail.com