श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २३६ ) ब्रह्म में सविशेषता ही हो सकती है; निर्विशेष मानने से उसमें प्रकाशतां नही रह सकती, वह तुच्छ (मिथ्या) हो जायगा । (३) ऽशास्त्रयोनित्वाधिकरणः— जगज्जन्मादिकारणं ब्रह्म वेदांतवेद्यमित्युक्तम्, तदयुक्तम्, तद्धि न वाक्य प्रतिपाद्यम् । अनुमानेन सिद्धेरित्याशंक्याह— जगज्जन्मादि के कारण ब्रह्म को वेदांत वेद्य बतलाया गया सो असंगत बात है, यह अनुमान सिद्ध वस्तु है, वाक्य प्रतिपाद्य नहीं, इस आशंका पर कहते हैं— शास्त्रयोनित्वात् ।१।१।३ शास्त्रं यस्ययोनि. कारणं प्रमाणम्, तच्छास्त्रयोनिः तस्यभावः शास्त्र योनित्वं । तस्मात् ब्रह्मज्ञानकारणत्वात् शास्त्रस्य, तद्योनित्वं ब्रह्मणः । अत्यन्तातीन्द्रियत्वेन प्रत्यक्षादिप्रमाणाविषयतया ब्रह्मणः शास्त्रैकप्रमाणकत्वात् उक्त स्वरूपं ब्रह्म——“यतो वा इमानि भूतानि” इत्यादि वाक्य बोधयत्येवेत्यर्थः । शास्त्र जिसकी योनि, कारण अर्थात् प्रमाण है उसे ही शास्त्रयोनि कहते है, उसके भाव या धर्म को शास्त्र योनिता कहते है । एक मात्र शास्त्र ही जब ब्रह्म विषयक ज्ञान का समुत्पादक हो तभी ब्रह्म की शास्त्र योनिता सिद्ध होती है । अत्यन्त अतीन्द्रिय होने से, प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों के अविषय ब्रह्म की शास्त्र प्रमाणता सिद्ध होती है । ऐसे ब्रह्म के स्वरूप को ही “यतो वा इमानि” इत्यादि वाक्यों में बतलाया गया है । पूर्वपक्ष:—ननु शास्त्रयोनित्वंब्रह्मणो न संभवति, प्रमाणांतर- वेद्यत्वाद् ब्रह्मणः । अप्राप्ते तु शास्त्रमर्थवत् । किं तर्हि तत्र प्रमाणम् । न तावत् प्रत्यक्षं । तद्धिद्विविधं, इन्द्रियसम्भवं योगसंभवं चेति । इन्द्रियसम्भवं च बाह्य संभवमान्तरसंभवश्चेति द्विधा । बाह्येन्द्रियाणि विद्यमानं सन्निकर्षं योग्यस्वविषयबोधजननानीति न सर्वार्थसाक्षात्कारतन्नि