भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( २५५ ) अत्राह-न वेदांतवाक्यानि ब्रह्म प्रतिपादयंति, प्रवृत्तिनिवृत्त्यन्वय विरहिणः शास्त्रस्यानर्थक्यात् । यद्यपि प्रत्यक्षादीनि वस्तुयाथात्म्याव- बोधे पर्यवस्यन्ति, तथाऽपि शास्त्रं प्रयोजनपर्यवसाय्येव न हि लोक- वेदयोः प्रयोजनरहितस्य कस्यचिदपि वाक्यस्य प्रयोग उपलब्धचरः। न च किंचित् प्रयोजनमनुद्दिश्य वाक्यप्रयोगः श्रवणं वा संभवति । तच्च प्रयोजनं प्रवृत्तिनिवृत्तिसाध्येष्टानिष्ट प्राप्तिपरिहारात्मकमुप- लब्धम् “अर्थार्थी राजकुलं गच्छेत्”--मंदाग्निर्नम्बुपिवेत्”--स्वर्ग- कामो यजेत्”--न कलंजं भक्षयेत्”--इत्येवमादिषु यत्पुनः सिद्ध- वस्तुपरेष्वपि “पुत्रस्ते जातः”-- “नायं सर्पः रज्जुरेषा” इत्यादिषु हर्ष-भयनिवृत्तिरूपपुरुषार्थान्वयो दृष्ट इत्युक्तम् । तत्र किं पुत्रजन्मा- द्यथतिपुरुषार्थावाप्तिः ? उत् तत् ज्ञानादिति विवेचनीयम् हताऽप्य- ज्ञातस्यार्थस्यापुरुषार्थत्वेन तत् ज्ञानादिति चेत्-तर्हि असत्यप्यर्थे ज्ञानादेव पुरुषार्थः सिध्यतीत्यर्थपरत्वाभावेन प्रयोजनपर्यवसायि- नोऽपि शास्त्रस्य नार्थसद्भावे प्रमाण्यम् । तस्मात् सर्वत्र प्रवृत्ति- निवृत्ति परत्वेन ज्ञानपरत्वेन वा प्रयोजनपर्यवसानमिति कस्यापि वाक्यस्य परिनिष्पन्ने वस्तुनि तात्पर्यासंभवान्त वेदांताः परि- निष्पन्नं ब्रह्म प्रतिपादयंति । (इस पर प्रतिपक्षी कहते हैं)—वेदांत वाक्य ब्रह्म प्रतिपादक नहीं हो सकते, प्रवृत्ति-निवृत्ति प्रतिपादन रहित शास्त्र व्यर्थ होते हैं। यद्यपि 'प्रत्यक्ष आदि प्रमाण, वस्तु के यथार्थस्वरूप को ही ज्ञात कराने में चरि- तार्थ हैं, तथापि शास्त्र प्रमाण एकमात्र प्रयोजन बोधक ही होता है। लोक और वेद कहीं भी प्रयोजन रहित किसी भी वाक्य का प्रयोग नहीं देखा जाता, और न थोड़े प्रयोजन के बिना वाक्य का प्रयोग ही मिलता है [ अर्थात् बिना प्रयोजन के कोई नहीं बोलता ] प्रयोजन, मनुष्य की प्रवृति और निवृति के अनुसार इष्ट प्राप्ति और अनिष्ट त्याग रूप ही होता है। "धन के इच्छुक को राजा के पास जाना चाहिए"--मंदाग्नि ankurnagpal108@gmail.com