भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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होता है । ब्रह्म को निष्प्रपंच बतलाने के लिए, ब्रह्म के प्रपंच विलय के वर्णन की विधि कही गई है । जीव नामधारी ब्रह्म, प्रपंच से मुक्त हो जाय, इसीलिए अनुष्ठान की विधि कही गई है, इसलिए सारे वाक्य ब्रह्म परक ही हैं । दृष्टि दृश्यात्मक जगत्-प्रपंच विलयन द्वारा ब्रह्म की ज्ञानैकरूपता का साधन करने वाली वह विधि क्या है ? इसका उत्तर— “न दृष्टे र्दृष्टारं पश्येः न मन्तेर्मन्तारं मन्वीथाः” इत्यादि वाक्य में दिया गया है । अर्थात् ब्रह्म को, दृष्टा और दृश्य भेद से शून्य केवल दृशिमात्र रूपवाला जानों । स्वतः सिद्ध होते हुए भी, ब्रह्म की कार्यता निष्प्रपंचता रूप होने से, विरुद्ध नहीं होती । तदयुक्तम्-नियोगवाक्यार्थवादिनां हि नियोगः, नियोज्य- विशेषणम् , विषयः करणम् , इति कर्त्तव्यता, प्रयोक्ता च वक्तव्याः । तत्र हि नियोज्यविशेषणमनुपादेयम् । तच्च निमित्तं फलमिति द्विधा । अत्र किं नियोज्य विशेषणं, तच्च किं निमित्तं फलं वेति विवेचनीयम् । ब्रह्मस्वरूपयाथात्म्यानुभवश्चेन्नियोज्यविशेषणम् , तर्हि न तन्निमित्तम्, जीवनादिवत्तासिद्धत्वात् निमित्तत्वे च तस्य नित्यत्वेनापवर्गोत्तरकालमपि जीवन्निमित्ताग्निहोत्रादिवत् नित्य- तद्विषयानुष्ठानप्रसंगः । नापि फलं नैयोगिकफलत्वेन स्वर्गादि- वदनित्यत्वप्रसंगात् । उक्त कथन असंगत है—नियोग को ही वाक्य का अर्थ बतलाने वाले को ही, नियोग, नियोज्य विशेषण विषय करण या साधन, इति कर्त्तव्यता (अनुष्ठान की पूर्वा पर कर्त्तव्य प्रणाली) और प्रयोक्ता इन सबका निर्धारण करके कुछ कहना चाहिए । वहाँ पर (निष्प्रपंचीकरण में) नियोज्य-विशेषण की तो कोई उपादेयता ही नहीं है । नियोज्य-विशेषण, निमित्त और फल रूप से दो प्रकार का होता है । उक्त स्थल में कौन सा नियोज्य-विशेषण हो सकता है, यह विवेचनीय विषय है । ब्रह्मस्वरूप के यथार्थ अनुभव को ही, नियोज्य-विशेषण कहा जाय, तो भी वह निमित्त तो हो नहीं सकता क्यों कि-वह जीवन की तरह सिद्ध अर्थात् पूर्वनिष्पन्न तो है नहीं, जिससे वह निमित्त हो सके । ब्रह्म के यथार्थ