श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
पृष्ठ 320, कुल 696 में से
संदर्भ में पढ़ेंरहेगा नहीं । नियोग की नित्यता होने से विषयानुष्ठान (यागादि क्रिया) की साध्यता भी समाप्त हो जायगी । यदि ब्रह्म से भिन्न कोई वस्तु नियोग है तो उसकी संपूर्ण प्रपंचनिवृत्तिरूप विषयानुष्ठान साध्यता और प्रयोक्ता दोनों ही नष्ट हो जावेंगे तथा आश्रय के अभाव से वह स्वयं (नियोग) भी अस्तित्व हीन हो जायगा । प्रपंचनिवृत्ति रूप अनुष्ठात्व से ही, ब्रह्म भिन्न समस्त वस्तुओ की निवृत्ति हो जायगी, फिर नियोग निष्पाद्य, मोक्ष नामक फल भी न होगा । किं च प्रपंचनिवृत्ते नियोगकरणस्य इति-कर्त्तव्यताऽभावात् अनुपकृतस्य च करणत्वऽयोगान्न करणत्वं । कथं इतिकर्त्तव्यता अभाव इति चेत् , इत्थम अस्येति कर्त्तव्यता भावरूपा अभावरूपा वा ? भावरूपा च करणशरीरनिष्पत्तितदनुग्रहकार्यं भेदभिन्ना । उभयविधा च न संभवति । न हि मुद्गरादि घातादिवत् कृत्स्नस्य प्रपंचस्य निवर्त्तकः कोऽपि दृश्यत इति दृष्टार्था न संभवति । नापि निष्पन्नस्य करणस्य कार्योत्पत्तावनुग्रहः संभवति । अनुग्राह- कांश सद्भावेन कृत्स्नप्रपंचनिवृत्ति रूपकरण स्वरूपासिद्धेः । ब्रह्मणोऽद्वितीयत्वज्ञानं प्रपंचनिवृत्ति रूपकरण शरीरं निष्पादयतीति चेत् तेनैव प्रपंचनिवृत्तिरूपो मोक्षः सिद्ध इति न करणादि निष्पाद्यम्, अवशिष्यत इति पूर्वमेवोक्तम् । अभावरूपत्वे चाभावा- देव न करणशरीरं निष्पादयति । नाऽप्यनुग्राहकः श्रतो निष्प्रपंच ब्रह्मविषयो विधिर्न संभवति । नियोग की करण रूप प्रपंचनिवृत्ति की इति कर्त्तव्यता के अभाव से उसके अनुकर्त्ता करणता का भी अभाव हो जाने से, करणता ही समाप्त हो जाती है (इसलिए प्रपंचनिवृत्ति कभी नियोग का करण नहीं हो सकती) यदि कहें कि-इति कर्त्तव्यता का अभाव कैसे हो सकता है ? तो सुनिये—इतिकर्त्तव्यता भावरूप या अभावरूप होती है । भावरूप वह दो प्रकार की होगी, एक करण शरीर स्वरूप निष्पादक, दूसरी करण की अनुग्राहक (उपकारी) सो, यहाँ दोनों प्रकार की नहीं हो