श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २६२ ) भेदाभेदयोः परस्परविरोधे सत्यनाद्यविद्यामूलत्वेनापि भेद प्रतीत्युपपत्तेरभेद एव परमार्थ इति निश्चीयते। तत्र ब्रह्म- ध्याननियोगेन तत्साक्षात्कारफलेन निरस्तसमस्ताविद्याकृत विविधभेदाद्वितीयज्ञानैकरसब्रह्मरूप मोक्षः प्राप्यते। एक बात और भी है यद्यपि वेदांत वाक्यों की परिनिष्पन्न सिद्धवस्तु परब्रह्म के स्वरूप निर्धारण में प्रमाणिक नहीं है फिर भी ध्यानविधि के सामर्थ्य से ब्रह्म का स्वरूप तो प्रामाणित होता ही है। ऐसा श्रुति प्रमाण भी है -"अरे! आत्मा द्रष्टव्य और ध्येय है' "जो निष्पाप है वह अन्वेषणीय है "वही विशेष रूप से जिज्ञास्य है "आत्मा का अस्तित्व स्वीकार कर उपासना करनी चाहिए "इत्यादि। यहाँ ध्यान के विषय में नियोग (विधि) है। नियोग का विषय रूप ध्यान कार्य, ध्येय सापेक्ष है। अर्थात् ध्येय के जाने बिना ध्यान हो नहीं सकता, इस प्रकार नियोग ही ध्येय वस्तु का अस्तित्व ज्ञापन करती है। स्व- पद वाच्य आत्मा ही ध्येय है,वह कैसा है? ऐसी आकांक्षा होने पर"ब्रह्म सत्य ज्ञान और अनंत स्वरूप है 'हे सौम्य ! यह जगत एक अद्वितीय सत् ही था "इत्यादि वाक्य आकांक्षित आत्मा के स्वरूप का प्रकाशन करके ध्यान विधि के अंग रूप से प्रमाणित होते हैं। इस प्रकार विधि के विषय रूप ध्यान से संश्लिष्ट ब्रह्म का स्वरूप भी,उक्त वाक्य का तात्पर्य है, ऐसा स्वीकारना होगा। "एक अद्वितीय ही निश्चित है" जो सत्य वही आत्मा है "जगत में कोई भिन्नता नहीं है" इत्यादि वाक्यों से एकमात्र ब्रह्म का स्वरूप ही सत्य ज्ञात होता है। प्रत्यक्ष आदि भेदावलम्बी प्रमाणों और कर्मशास्त्र से भेद की प्रतीति होती है। यद्यपि इस प्रकार भेद और अभेद दो परस्पर विरुद्ध बातें हैं,पर भेद प्रतीति को अनादि अविद्यामूलक मान लेने से विरोध का परिहार हो जाता है तथा अभेद प्रतीत ही परमार्थ रूप पर निश्चित होती है और फिर,ब्रह्म साक्षात् रूप फल वाले,ब्रह्म ध्यान नियोग (विधि) से अविद्याकृत सारे भेद समाप्त हो जाते हैं एवं अद्वितीय ज्ञानैकस्वभावब्रह्मस्वरूप मोक्ष प्राप्त हो जाता है। न च वाक्यात् वाक्यार्थज्ञानमात्रेण ब्रह्म भावसिद्धिः