भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

पृष्ठ 324, कुल 696 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 324

( २६४ ) मिथ्या होने से ही वह ज्ञान द्वारा निवार्य है, तो वाक्यार्थज्ञान से ही भेद बुद्धि का निवारण हो जायगा, नियोग (विधि) की आवश्यकता तो समझ में आती नहीं। मोक्ष को यदि नियोग साध्य मानेंगे तो स्वर्गादि की तरह उसकी अनित्यता भी स्वीकारनी पड़ेगी, जबकि मोक्ष की नित्यता सभी लोग मानते हैं। तथा जब, धर्म और अधर्म, अपने फलभोग के उपयुक्त शरीरो- त्पादक होने से ही फल के हेतु कहे जाते हैं। ब्रह्मा से लेकर तृणपर्यन्त चारों प्रकार के शरीरों से संबंधित संसार की प्राप्ति अवश्यंभावी हो जावेगे इसलिए मोक्ष को धर्म साध्य नहीं मान सकते। ऐसा ही श्रुति का प्रमाण भी है—"शरीरधारी उसके प्रिय और अप्रिय (सुख और दुःख) निवृत्त नहीं होते, शरीर रहित होने पर प्रिय अप्रिय स्पर्श नहीं कर सकते” इस प्रकार शरीर रहित मोक्ष में, धर्म-अधर्म से साध्य प्रियअप्रिय की हीनता कही गई है। इससे ज्ञात होता है कि--मोक्ष वस्तु धर्म साध्य नहीं है। ऐसा भी नहीं है कि—नियोग (विधि विशेष) साध्यफल विशेष की तरह, ध्यान नियोग से, अशरीरता साध्य हो सके। अशरीरता ही तो आत्मा का वास्तविक स्वरूप है, इसलिए वह किसी भी प्रकार साध्य नहीं हो सकता। जैसा कि—श्रुतियाँ कहती हैं—"स्वभाव से-अशरीर, अनवस्थित (क्षणभंगुर) शरीरों में स्थित, महान और विभु आत्मा का मनन करके धीर व्यक्ति, शोक नहीं करते”—आत्मा, प्राण और मन रहित समुज्वल है “यह आत्मा अनासक्त है, इत्यादि। इस प्रकार अश- रीरतारूप मोक्ष नित्य है, इसलिए धर्मसाध्य नहीं हो सकता। वैसा ही श्रुतिवाक्य भी है—"धर्म से पृथक् अधर्म से पृथक्, भूत-भविष्य-वर्तमान घटित पदार्थों से पृथक्, कृतकार्य से पृथक् अकृत से पृथक् जिस वस्तु को आप जानते हों उसे बतलावें।" अपि च—उत्पत्तिप्राप्तिविकृतिसंस्कृतिरूपेण चतुर्विधं हि साध्यत्वं मोक्षस्य न संभवति । न तावदुत्पाद्यः, मोक्षस्य ब्रह्म स्वरूपत्वेन नित्यत्वात् । नापि प्राप्यः आत्मस्वरूपत्वेन ब्रह्मणो नित्य प्राप्तत्वात् । नापि विकार्यः दध्यादिवदनित्यत्वप्रसंगादेव । नापि संस्कार्यः संस्कारो हि दोषापनयनेन वा गुणाधानेन वा ankurnagpal108@gmail.com