भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( २८४ ) है, इसलिए एकाकार प्रतीति संभव नहीं है । अतएव जीव की भी भिन्नाभिन्नता, ब्रह्म के साथ नहीं हो सकती । शास्त्रमूलक अभेद ही यथार्थ है, भेद प्रत्यय को अनादि अविद्यामूलक ही मानना चाहिए । ननु एवं ब्रह्मण्येवाज्ञत्वं तन्मूलाश्च जन्मजरामरणादयो दोषाः प्रादुष्युः । ततश्च—“यः सर्वज्ञः सर्ववित्” एषह्यात्माऽपहतपाप्मा” इत्यादीनि शास्त्राणि वाध्येरन् । नैवम्—अज्ञानादिदोषाणामपारमार्थत्वात् । भवतस्तूपाधि ब्रह्मव्यतिरिक्तं वस्त्वन्तरमनभ्युपगच्छतो ब्रह्मण्येवोपाधि संसर्गस्त- त्कृताश्च जीवत्वाज्ञत्वादयोदोषाः परमार्थत एव भवेयुः, न हि ब्रह्मणि निरवयवेऽच्छेद्ये संबद्धयमाना उपाधयस्तच्छित्त्वाभित्त्वा वा संबध्यन्ते । अपितु ब्रह्मस्वरूपे संयुज्य तस्मिन्नेव स्वकार्याणि कुर्वन्ति । ( इस पर भेदाभेद वादी कहते हैं ) जीव ब्रह्म का नित्य अद्वैत संबंध होने से, जीव के जन्म, जरा, मरण आदि दोष ब्रह्म को भी दूषित कर देंगे जिससे—“जो सर्वज्ञ सर्वविद् है” वह निष्पाप है” इत्यादि ब्रह्मपरक श्रुतियां बाध्य हो जायेंगी । ( उक्त कथन का निराकरण)—आपने जिन दोषों की चर्चा की है वे अज्ञानादि दोष पारमार्थिक नहीं हैं । ( वाद ) आप उपाधि और ब्रह्म के अतिरिक्त किसी अन्य वस्तु का अस्तित्व तो स्वीकारते नहीं, इसलिए ब्रह्म का उपाधि संसर्ग स्वाभाविक ही होगा, तथा उपाधिकृत जीवता, अज्ञता आदि परमार्थ रूप से ब्रह्म में घटित होंगे । ( विवाद ) निरवयव और अच्छेद्य ब्रह्म में संश्लिष्ट उपाधियाँ . ब्रह्म का छेदन भेदन करके उसमें प्रविष्ट हो जाती हों, ऐसा तो संभव है नहीं, अपितु ब्रह्म के स्वरूप से संश्लिष्ट होकर, उनमें अपने अपने कार्यों का प्रयोग मात्र करती हैं । ankurnagpal108@gmail.com