भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

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( २८६ ) परिमाण का है इसलिए जीव में भी अणुता है। वह जीव का अवच्छेदक भी अनादि है, इसलिए उपाधिविशिष्ट देश ( जीव ) में जो दोष होते हैं, वे अनुपहित ( उपाधि संबंध रहित ) ब्रह्म से संबंद्ध नहीं हो सकते । इस पर प्रष्टव्य यह है कि—अणु परिमाणवाला जीव उपाधि परिच्छिन्न ब्रह्म का अंश है, अथवा उपाधि अनवच्छिन्न ब्रह्म का ? अणुरूप उपाधि संयुक्त ब्रह्म का प्रदेश ( अंश ) विशेष है, अथवा उपाधि संयुक्त ब्रह्म का ही रूप है ? उपाधि संयुक्त कोई दूसरा चेतन है, अथवा उपाधि ही है ? इसमें—उपाधि परिच्छिन्न ब्रह्म का अंश तो कहा नहीं जा सकता, क्योंकि—ब्रह्म अविच्छिन्न है। उक्त कल्पना से जीव की आदिमता भी होती है, जबकि जीव अनादि है । एक वस्तु को दो करना ही परिच्छिन्नता है। दूसरे कल्पानुसार जब जीव ब्रह्म का ही प्रदेश माना गया है तो जीव के उपाधि से संबद्ध होने से, सारे औपाधिक दोष ब्रह्म के ही मानें जायेंगे। उपाधि कभी स्थिर तो रहती नहीं इसलिए जब वह एक स्थान से दूसरे स्थान पर जायगी तो अपने साथ, संयुक्त उस ब्रह्म प्रदेश को ले न जा सकेगी, उस समय निश्चित ही उसका उस प्रदेश से संबंध विच्छेद हो जायगा, इस प्रकार जीव का क्षण-क्षण में बंधन और मोक्ष होता रहेगा। यदि वह उपाधि उस प्रदेश को भी आकृष्ट करके ले जायगी तो उस प्रदेश का अभिन्न अंगी ब्रह्म भी खिंचता चला जायगा । यदि अखण्ड, सर्वव्यापी ब्रह्म का खिंचाव असंभव मानते हो तो, फिर भी क्षण-क्षण बंधन मोक्ष का दोष तो, घटित होगा ही। उपाधि से अविच्छिन्न ब्रह्म के प्रदेशों में, समस्त उपाधियों की संसर्गता से ज्ञान की अभिन्नता प्रतीत होने लगेगी। जीवों को यदि, ब्रह्म के भिन्न-भिन्न प्रदेशों का माने और उस नाते उनके ज्ञानों की भी विभिन्नता मान लें तो एक की अपनी उपाधि दूसरे के प्रदेश में चले जाने पर, एक ही व्यक्ति को पूर्वापर स्मृति ही न रह जायगी। तीसरी कल्पना में, उपाधि संबद्ध होने से, स्वरूपतः ब्रह्म ही जब जीवता को प्राप्त करता है तो, जीव से विलक्षण, अनुपहित (उपाधि-

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