भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( ३२६ ) त्वम्, अतः एव “अरुणयैकहायन्या पिंगाक्ष्या सोमं क्रीणाति” इत्या- रुण्यादिविशिष्टैकहायन्या क्रयः साध्यतया विधीयते । इससे सिद्ध होता है कि समानाधिकरण पदों की अनेक विशेषण विशिष्ट एकार्थ बोधकता है । जैसे कि-“रक्तवर्णा पिंगाक्षी एक वर्ष वाली गो के बदले वह सोम खरीदता है” इसमें अरुणत्वादिविशिष्ट गौ से सोमक्रय की साध्यता बतलाई गई है । तदुक्तम् ”अर्थैकत्वे द्रव्यगुणयोरैककर्म्यान् नियमः स्यात्” इति । तत्रैवं पूर्वपक्षी मन्यते-यदप्यरुणयेति पदमाकृतेरिव गुणस्यापि द्रव्य- प्रकारतैकस्वभावत्वाद् द्रव्यपर्यन्तमेवारुणिमानमभिदधाति, तथाऽ- प्येकहायनि अन्वयनियमोऽरुणिम्नो न संभवति, एकहायन्या क्रीणाति तच्चारुण्येत्यर्थद्वयविधानासम्भवात् । ततश्चारुण्येति वाक्यं भित्वा प्रकरणविहितसर्वद्रव्यपर्यन्तमेवारुणिमानमविशेषेणाभिदधाति । अरुण्येति स्त्रीलिंगनिर्देशः प्रकरणविहित सर्वलिंगद्रव्याणां प्रदर्शनार्थः । तस्मादेकहायनि अन्वयनियमोऽरुणिम्नो न स्यात् इति । पूर्वमीमांसादर्शन में कहा गया है कि--“अर्थ ( प्रयोजन ) यदि एक हो तो गुण और द्रव्य ( अर्थात् विशेष्य और विशेषण ) का एक कर्म से ही प्रयोजन सिद्ध होगा, ऐसा नियम है ।” इस नियम के अनुसार पूर्व पक्षी ऐसा मानते हैं कि- आकृति के समान गुण भी जब द्रव्य का प्रकार ( विशेषण ) होता है तब आकृति और गुण एक स्वभाव के होते हैं “अरुणा” पद अरुणिमा युक्त द्रव्य का सही अर्थ “लाल गौ” ठीक ही करता है, फिर भी “अरुणिमा” की एकहायनीयता के साथ अन्वय की आवश्यकता सिद्ध नहीं हो पाती । “एकवर्षीया से खरीदत। है” और वह भी “लाल रंग वाली से” ये दो भिन्न विशेषताओं को बतलाने वाले, समानता के विपरीत विशेषण हैं । इन दोनों को मानने से ‘अरुणा’ इत्यादि वाक्य से, प्रकरणस्थ सभी द्रव्यों का अरुणिमा से संबंध हो जाता है । अरुणया” पद में जो स्त्रीलिंग का निर्देश किया गया है, वह प्रकरणस्थ