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श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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पृष्ठ 392, कुल 696 में से

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( ३३२ ) पदसमूह समष्टि रूप हों अथवा पृथक्-पृथक् हों, दोनों ही स्थिति में, एक दो या अनेक गुण विशेषित वस्तु का बोध कराकर, सामानाधिकरण्य से समस्त विशेषणों से विशिष्ट वस्तु एक है, यही प्रतिपादन किया जाता है। इसलिए समस्त विशेषण विशिष्ट वस्तु का जो क्रिया विशेष के साथ संबंध दिखलाया जाता है उसमें कोई विरोध नहीं है। "श्यामवर्ण- वाला युवा रतनारे नैन का कुण्डलधारी देवदत्त लाठी लेकर खड़ा है", "धवल वस्त्र से परदा बनावेगा" "नीले रंग का कमल लाओ", श्वेत आँखों वाली गाय लाओ", "पथिकृत अग्नि के लिए अष्टकपाल ( आठपात्रों मे क्षोधित ) पुरोडाश ( पिष्टक के प्रकरण का एक खाद्य विशेष ) दूँगा" इत्यादि उदारहणों की तरह "रक्तवर्णा, एकहायनी, कपिलनेत्री गाय से सोम खरीदता है" इस उदाहरण मे भी सामानाधिकरण्य विशिष्ट का एकत्व प्रतिपादन करना चाहिये। एतदुक्तं भवति-यथा-"काष्ठैःस्थाल्यामोदनंपचेत्" इत्यनेक- कारकविशिष्टैकाक्रिया युगपत् प्रतीयते, तथा समानाधिकरण- पदसंघाताभिहितमेकैकंकारकं तत्तत्कारकप्रतिपत्तिवेलायामेवानेक- विशेषणविशिष्टं युगपत् प्रतिपन्नं क्रियायामन्वेतीति न कश्चिद् विरोधः "खादिरैः शुष्कैः काष्ठैः समपरिमाणे भाण्डे पायसं शाल्यो- दनं समर्थः पाचकः पचेत्, इत्यादिषु" इति। कथन यह है कि- "सूखी लकड़ियों से बटुये में चावल पकाता है" इस उदाहरण में जैसे एक साथ ही काष्ठादि अनेक कारक विशिष्ट एक क्रिया का ज्ञान होता है, सामानाधिकरण्य के प्रसंग में भी वैसे ही, पद समूह में प्रयुक्त एक-एक कारक की जब प्रतिपत्ति की जाती है, तब उन सबका एक साथ अनेक विशेषण विशिष्ट क्रिया में, निर्विरोध समन्वय हो जाता है। जैसे कि-"सूखी लकड़ियों मे उचित परिमाण वाले पात्र में शाली के चावल की खीर चतुर रसोइया पकाता है" इत्यादि में एक क्रिया से संबंद्ध कारकों में कोई विरोध नहीं है। यत्तूपात्तद्रव्यकवाक्यस्थगुणशब्दः केवल गुणाभिधायीत्यरुण- येति पदेन केवलगुणस्यैवाभिधानमिति तन्नोपपद्यते, लोकवेदयो-

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