भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

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ग्रन्थकार परिचिति : श्री माधवाङ्घ्रि जलजद्वय नित्यसेवा प्रेमाविलाशय पराङ्कुश पादभक्तम् । कामादिदोषहरमात्मपदाश्रितानां रामानुजं यतिपतिं प्रणमामि मूर्ध्ना ॥ सर्वत्र पूर्ण रूप से व्याप्त, तीनो कालो में विद्यमान तथा सब प्राणियो और पदार्थों के स्वरूपभूत ब्रह्म को जो महापुरुष पवित्र, एकाग्र वेदान्त संस्कार युक्त अन्त.करण से अभेद भाव से स्पष्ट अनुभव करते है वे महापुरुष ब्रह्म वेत्ता कहे जाते है । ऐसे ब्रह्मविद् महापुरुषो का अवतार इस पवित्र देव भूमि भारत में समय समय पर होता रहता हे श्री रामानुजाचार्य इसी श्रेणी के अन्यतम महा- पुरुष है । विक्रम संवत् १०७४ मे दक्षिण भारत में भूतपुरी वर्तमान पेरम्बुदूरम स्थान पर श्री केशव जी सोमयाजी के घर माता कान्तिमती जी के गर्भ से मेष राशि के सूर्य और आर्द्रा नक्षत्र मे आचार्य चरण का प्रादुर्भाव हुआ । प्रसिद्धि हे कि ससाराग्नि से प्रदीप्त जीवों के उद्धार के लिए भगवान विष्णु की आज्ञा से शेष जी ने ही आचार्य रूप से अवतार धारण किया था पिता की आज्ञा से यज्ञो- पवीत के बाद आप कांची मे यादव प्रकाश जी के पास विद्याध्ययन के लिए गए, आचार्य की कुशाग्र बुद्धि और शास्त्र विवेचन की अद्भुत शैली से यादव प्रकाश जी को अमर्ष होना स्वाभाविक था । आगे चल कर उसने वैमनस्य का रूप धारण किया । यादव प्रकाश जी ने आचार्य की हत्या करने का प्रयास किया, अन्तत' श्री रामानुज गुरुकुल मे अधिक दिन नही ठहर सके । अल्पवय में ही माता की आज्ञा से इन्होने विवाह किया, किन्तु इनका गार्हस्थ्य जीवन भी कलहपूर्ण रहा । कटु- भाषिणी स्त्री के दुर्व्यवहार से खिन्न होकर आचार्य ने त्रिदण्ड सन्यास ग्रहण कर अपने को वैष्णव धर्म के प्रचार मे पूर्णतः अर्पित कर दिया । उन्ही दिनो श्रीरगम् में श्री यामुनाचार्य जी वैष्णव धर्म के प्रचार कार्य मे लगे हुए थे, उन्होंने आचार्य रामानुज की प्रशस्ति श्रवण की और अपने शिष्य महापूर्ण स्वामी को आचार्य को कांची से लिवा लाने के लिए भेजा, आचार्य भी श्री यामुनाचार्य जी से मिलने के लिए बहुत दिनो से उत्सुक थे, वे जब तक श्री रंगम पधारे तब तक दुर्भाग्य से यामुनाचार्य जी का परलोक हो गया अतः आचार्य ने महापूर्ण स्वामी से ही दीक्षा ग्रहण की । आचार्य की सन्यास दीक्षा गोष्ठीपूर्णस्वामी द्वारा हुई । यामुनाचार्य जी ने ब्रह्मसूत्र भाष्य की रचना, दिल्ली के तत्कालीन शासको के महल से भगवान श्रीराम के श्री विग्रह का उद्धार और विशिष्टाद्वैत सिद्धान्त का प्रचार करने की प्रबल कामना की थी, आचार्य रामानुज ने इन तीनो को पूर्ण किया । भाष्य रचना के लिए वे अपने अभिन्न सहयोगी कुरेश स्वामी को लेकर काश्मीर पधारे, वहाँ उन्होने सरस्वती पीठ मे बोधायन वृत्ति देखी, कुरेश स्वामी ने प्रायः सम्पूर्ण ग्रन्थ को कठस्थ कर लिया, उसी के आधार पर आचार्य ने ब्रह्म सूत्र भाष्य की रचना की जो कि श्रीभाष्य के नाम से प्रसिद्ध हुआ, जिसे आज आपके समक्ष लोक भाषा विवर्त्त के साथ प्रस्तुत किया जा रहा है । दिल्ली के शासकों से श्रीराम के श्रीविग्रह को सम्पत् कुमार कह कर आचार्य जी ने ग्रहण किया । आचर्य को एक हयग्रीव का विग्रह कश्मीर में भी प्राप्त हुआ था जिसकी आराधना से ही आचार्य को वाग्वैभव प्राप्त हुआ । आजकल यह विग्रह, मैसूर के परकाल मठ मे विराजमान है । ankurnagpal108@gmail.com