भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

पृष्ठ 421, कुल 696 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 421

( ३६१ ) तदिमाह श्रुतिः—“अजायमानो बहुधा विजायते” इति स्मृतिश्च— “अजोऽपि सन् अव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्। प्रकृतिं स्वाम- धिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया। परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृतां” इति । परम करुणामय भगवान्, दयावश स्वेच्छा से अपने स्वाभाविक दिव्यरूप को, उपासकों की क्षमता के अनुसार उनपर कृपा करने के लिए देव मनुष्य आदि सगुण प्राकृत देहों में परिणत कर देते हैं। जैसा कि श्रुति में—वह अजन्मा प्रायः प्रकट होता है "तथा स्मृति में भी"— अजन्मा और अविनाशी, सर्व नियामक मैं अपनी स्वाभाविक प्रकृति माया के आश्रय से प्रकट होता हूँ सज्जनों की रक्षा और दुष्टों के संहार के लिए ही मेरा अवतार होता है।" इत्यादि स्पष्ट कहा गया है। साधवो हि उपासकाः तत्परित्राणमेवोद्देश्यम् आनुषंगिकस्तु दुष्कृतां विनाशः संकल्पमात्रेणापि तदुत्पत्तेः । “प्रकृतिं स्वाम्” प्रकृतिः स्वभावः, स्वमेव स्वभावमास्थाय न संसारिणां स्वभावा- नित्यर्थः । आत्ममाययेति स्वसंकल्प रूपेण ज्ञानेन इत्यर्थः । “माया वयुनं ज्ञानं” इति ज्ञान पर्यायमपि माया शब्दं नैघण्टुका अधीयते । उक्त स्मृति वाक्य में साधु का तात्पर्य उपासक से है, उन्हीं के परित्राण के लिए प्रभु प्रकट होते हैं, दुष्टों के विनाश की बात तो प्रासं- गिक है, संकल्प मात्र ही प्रभु के अवतार में पर्याप्त है। “प्रकृतिं स्वाम्” में प्रकृति का तात्पर्य है स्वभाव, स्वाम् अर्थात् अपनी प्रकृति के आधार से ही प्रभु प्रकट होते हैं, संसारी स्वभाव प्राकट्य का आधार नहीं होता । आत्ममायया का तात्पर्य है, स्वसंकल्प रूप ज्ञान "ज्ञान के पर्याय रूप में माया शब्द का प्रयोग निघंटु में “मायावयुनं ज्ञानं" किया गया है । आह च भगवान पाराशरः “समस्ताश्शक्तयश्चैतानृप यत्र प्रति- ष्ठिताः, तद् विश्वरूपवैरूप्यं रूपमन्यद् हरेर्महत् । समस्त शक्ति ankurnagpal108@gmail.com