श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरमात्मा का आदित्य आदि जीवों से स्पष्ट भेद दिखलाया गया है—"जो आदित्य में रहते हुए भी आदित्य से भिन्न है, उसे आदित्य नहीं जानता, आदित्य उसका शरीर है, वह आदित्य में बैठकर उसका संयमन् करता है—जो आत्मा में होते हुए भी उससे भिन्न है, उसे आत्ना नहीं जानता, आत्मा उसका शरीर है अन्तर्यामी रूप से वही आत्मा का संयमन करता है—जो अक्षर में संचरित है, अक्षर जिसका शरीर है अक्षर उसे नहीं जानता—जो मृत्यु ( जगत ) में संचरित है, मृत्यु उसका शरीर है, मृत्यु उसे नहीं जानता, वह सर्वान्तर्यामी, निष्पाप दिव्य एकमात्र नारायण है।" इस वाक्य में निष्पाप परमात्मा का शरीर जीवों को बतलाकर, उनका अन्तर्यामित्व बतलाया गया है। इससे सिद्ध होता है कि- परमात्मा, हिरण्यगर्भ आदि जीवों से सर्वथा विलक्षण है। ८ अधिकरण :— "यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते" इति जगत् कारण ब्रह्मेत्यवगम्यते। किं तज्जगत्कारणमित्यपेक्षायां "सदेव सोम्येदमग्र आसीत तत्तेजोऽसृजत्-आत्मा इदमेव एवाग्र आसीत्-स इमांल्लो- कानसृजत् तस्माद् वा एतस्मादात्मन् आकाशस्सम्भूतः" इति साधा- रणैशब्दैर्जगत्कारणे निर्दिष्टे ईक्षणविशेषानन्दविशेषरूपविशेषार्थ स्वभावात् प्रधानक्षेत्रज्ञादिव्यतिरिक्तं ब्रह्मेत्युक्तम्। इदानीमाका- शादि विशेषशब्दैर्निर्दिश्य जगत्कारणत्वजगदैश्वर्यादिवादेऽप्याका- शादिशब्दाभिधेयतयाप्रसिद्धचिदचिद्वस्तुनोऽर्थान्तरमुक्तलक्षणमेव ब्रह्मे- ति प्रतिपाद्यते आकाशास्तल्लिङ्गात् इत्यादिना पादशेषेण— जिससे ये सारे भूत उत्पन्न होते हैं"—इस उदाहरण से ज्ञात होता है कि-जगत् के कारण परमात्मा ही हैं। उस जगत् के कारण का स्वरूप क्या है ? ऐसी आकांक्षा होने पर निम्न श्रुतियाँ सामने आती हैं-"हे सौम्य ! सृष्टि के पूर्व एक सत् ही था—उसने तेजकी सृष्टि की-जगत् पहिले आत्मस्वरूप ही था-जिसने इन लोकों की सृष्टि की—उम आत्मा से आकाश उत्पन्न हुआ" इन श्रुतियों में साधारण शब्दों से जगत्कर्त्ता