भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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३३ २. (सिद्धान्त)-श्रुति और युक्ति के आधार पर जीव की नित्यता का समर्थन तथा एक विज्ञान से सर्व विज्ञान का उपपादन। —पृ० ८३३-३६, ४. ज्ञाधिकरण सूत्र (१६-३२) १. जीवात्मा का स्वरूप निरूपण । २, पूर्वपक्ष—जीवात्मा की चैतन्य रूपता का समर्थन । ३. (सिद्धान्त]—आत्मा की ज्ञानरूपता का निराकरण तथा ज्ञान विशिष्टता का प्रतिपादन । जीव की लोकान्तर गमनागमना बोधक श्रुति के आधार परसर्वव्यापकता का खंडन । जीव की अणु परिमाणता का प्रतिपादन लोकान्तर गमनागमन में जीव के कर्त्तृत्व का समर्थन । ४ विज्ञानमय शब्द से जीव एवं उसकी सर्वव्यापकता मानने वाले सिद्धान्त का निराकरण, उसकी ब्रह्मा- र्थता का निरूपण । अणु परिमाण बोधक शब्द तथा दृष्टान्त के आधार पर जीव की अणुता का समर्थन । अणु जीव की सर्वांगीण उपलब्धि का समर्थन । जीव की हृदयस्थिति का समर्थन । एक स्थित प्रदीपादि की तरह जीव की भी सर्वांगीण ज्ञानरूप अनुभूति का प्रतिपादन । आत्म गुण ज्ञान की आत्मातिरिक्तता का प्रदर्शन । ज्ञान और आत्मा के पृथक निर्देश का समर्थन । ज्ञान प्राधान्यता के आधार पर ही, आत्मा में ज्ञान शब्द की व्यवहार्यता का सम्मोदन । ज्ञान और आत्मा के नित्य साहचर्य के कारण आत्मा के लिए प्रयुक्त विज्ञान शब्द के प्रयोग का उपपादन । सुषुप्ति आदि अवस्थाओं में ज्ञान की अप्रतीति होते हुए भी ज्ञान की आत्मगुणता का समर्थन । आत्मा की सर्वव्यापकता और ज्ञानमयता में दोष प्रदर्शन ।—पृ० ८३६-५०, ५. कर्त्ताधिकरण (सूत्र ३३-३६) जीवात्मा के कर्त्तृत्व का निरूपण । इन्द्रियग्रहण और परिभ्रमण में आत्मा के कर्त्तृत्व का निरूपण ankurnagpal108@gmail.com