श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
पृष्ठ 456, कुल 696 में से
संदर्भ में पढ़ें( ३६६ ) इस प्रकार परब्रह्म से उत्पन्न होने से, उन्ही में लीन होने से और उन्ही से प्राणित होने से जगत की तदात्मकता सिद्ध हो जाती है। इसी प्रकार “सर्व प्रकार, सर्व शरीर, सर्वात्मभूत परब्रह्म की शान्त रूप से उपासना करो” इत्यादि श्रुति परब्रह्म की सर्वात्मकता का उपपादन करके उनकी उपासना का उपदेश करती है। परब्रह्म ही, कारणावस्थ और कार्यावस्थ सूक्ष्म-स्थूल चेतन-जड़ शरीर धारण करने से सर्वात्मभूत हैं। ऐसे तादात्म्य प्रतिपादन से परब्रह्म के हेय और उत्तम गुणों में कोई विरुद्धता नहीं होती। उक्त शरीर उन्हीं के प्रकार अर्थात् विशेषण रूप हैं। विशेषणगत दोषराशि कभी प्रकारी विशेष्य में संभव नहीं है, अपितु वह अत्यधिक ऐश्वर्य शाली परमात्मा की गुण स्वरूप होगी; ऐसा हम पहिले ही कह चुके हैं। यदुक्तं जीवस्य सर्वतादात्म्यमुपपद्यत इति, तदसत्, जीवानां प्रतिशरीरं भिन्नानामन्यतादात्म्यासम्भवात् । मुक्तस्याप्यनवच्छिन्न- स्वरूपस्यापि जगत्तादात्म्यं जगज्जन्मस्थितिप्रलयकारणत्वनिमित्तं न संभवतीति “जगद्व्यापारवर्ज्यम् ” इत्यत्र वक्ष्यते । जीवकर्मनिमित्तत्वाज्जगज्जन्मस्थितिलयानां स एव कारण- मित्यपिन साधीयः, तत्कर्मनिमित्तत्वेऽपीश्वरस्यैव जगत्कारणत्वात् । अतः परमात्मैवाऽत्र ब्रह्मशब्दाभिधेयः । इममेव सूत्रार्थमभियुक्ता बहुमन्वते । यथाह वृत्तिकारः “सर्वं खल्विति सर्वात्मा ब्रह्मेशः” । जो यह कहते हैं कि—जीव का सबसे तादात्म्य हो सकता है यह कथन भी असंगत है, क्योंकि जीवों का अनेक शरीरों में आश्रय रहता है इसलिए उनमें परस्पर तादात्म्य कभी संभव नहीं है। मुक्तात्मा जीव का भी, जगत्जन्मस्थितिलयकारणत्व निमित्तक तादात्म्य संभव नहीं है, सूत्रकार “जगद्व्यापारवर्ज्यम्” सूत्र में मुक्तात्मा को जागतिक व्यापारों से रहित बतलाते हैं । जीव का कर्म ही, जगत की सृष्टि स्थिति और लय का निमित्त कारण होता है, वही जीव जगत का उपादान कारण भी हो, ऐसा संभव नहीं है। जीव के कर्मानुसार ईश्वर जगत की रचना करता है, अतएव