श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४१६ ) गुणविधानार्थं च "य एषोऽक्षिणि पुरुषः" इत्यभिधानात् । एवकारो नैरपेक्ष्यं हेतोद्योतयति । इसलिए भी नेत्रों में स्थिति पुरुषोत्तम हैं कि-- 'ब्रह्म क ( सुख- विशिष्ट ) तथा ख ( आकाश ) स्वरूप हैं" इस वाक्य में जिस सुख- विशिष्ट ब्रह्म को उपासना योग्य संयद्वाम आदि गुणों वाला बतलाया गया है, उन्हें ही "य एषोऽक्षिणि" इत्यादि में नेत्रस्थानीय बतलाया गया है । एकमात्र सुखविशिष्ट हेतु से ही अक्षि-पुरुष का परमपुरुषत्व प्रमा- णित हो सकता है । नन्वग्निविद्याव्यवधानात् "कं ब्रह्म" इति प्रकृतंब्रह्म नेह सन्निधत्ते । तथा हि-अग्नयः "प्राणो ब्रह्म कं ब्रह्म खं ब्रह्म" इति ब्रह्म विद्यामुपदिश्य "अथहैनं गार्हपत्योऽनुशशास" इत्यारभ्याग्नीनामु- पासनमुपदिदिशुः । न चाग्निविद्या ब्रह्मविद्यांगमिति शक्यं वक्तुम्; ब्रह्मविद्याफलानन्तर्गततद्विरोधिसर्वायुः प्राप्ति संतत्यविच्छेदादिफल श्रवणात् उच्यते— "प्राणो ब्रह्म"— "एतदमृतमभयमेतद् ब्रह्म" इत्युभयत्र ब्रह्म संशब्दनात् । "आचार्यस्तु ते गतिं वक्ता" इत्याग्नि- वचनाच्च गत्युपदेशात् पूर्वं ब्रह्मविद्याया असमाप्तेस्तन्मध्यगताग्नि- विद्या ब्रह्मविद्यांगमिति निश्चीयते । "अथ हैनं गार्हपत्योऽनुशशास" इति ब्रह्मविद्याधिकृतस्यैवाग्निविद्योपदेशाच्च । संशय होता है कि--अग्निविद्या का व्यवधान स्वरूप उपदेश "क ब्रह्म" के प्रसंग में ठीक नहीं जचता । जैसा कि--तीन प्रकार की अग्नि का "प्राण ब्रह्म, क ब्रह्म, ख ब्रह्म" ब्रह्म विद्यात्मक उपदेश देकर "उसके बाद उसे गार्हपत्य अग्नि का उपदेश दिया" इस वाक्य से प्रारंभ करके सभी अग्नियों की उपासना का उपदेश दिया गया है । यह नहीं कह सकते कि--अग्निविद्या ब्रह्मविद्या का अंग है, क्योंकि-पूर्णायु और संतति परम्परा की प्राप्ति ही अग्निविद्या का फल है जो कि ब्रह्मविद्या के फल से सर्वथा विपरीत है । इसलिए विपरीत फलवाली विद्याओं का एक साथ उपदेश अप्रासंगिक है । ankurnagpal108@gmail.com