श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४४३ ) उनके निकट गए । उद्दालक ने इन वैश्वानर तत्त्व के जिज्ञासुओं को देखकर, अपने को वैश्वानर तत्त्व का विशेषज्ञ न मानते हुए “उनसे कहा—आजकल केकय देश के राजा अश्वपति ही वैश्वानर तत्त्व के विशेषज्ञ हैं, चलिए हम लोग उनके पास चले” इस प्रकार वे उद्दालक आदि छहों ऋषि अश्वपति के पास पहुँचे । स च तान्महर्षीन् यथार्हं पृथगमभ्यर्च्य “न मे स्तेनः” इत्यादिना “यक्ष्यमाणो ह वै भगवन्तोऽहमस्मि” इत्यंतेनात्मनो व्रतस्थतया प्रतिग्रहयोग्यतां ज्ञापयन्नेव ब्रह्मविद्भिरपि प्रतिषिद्ध परिहरणीयतां विहितकर्मकर्त्तव्यतां च प्रज्ञाप्य “यावदेकैकस्मा ऋत्विजे धनं दास्यामि तावद् भगवद्भ्यो दास्यामि वसंतु भवन्तः” इत्यवोचत् । अश्वपति ने उन सबकी यथायोग्य अलग-अलग पूजा करके ‘मेरे राज्य मे चोर नहीं है” इत्यादि से लेकर “महापुरुषों मैं यज्ञ करना चाहता हूँ” इस वाक्य तक, अपने को व्रतस्थित प्रतिग्रह योग्य बतलाकर‘ ब्रह्मवेत्ताओं के लिए निषिद्ध कर्म की त्याज्यता तथा विहित कर्म की कर्त्तव्यता का उल्लेख करके ‘एक एक ऋत्विजों को जितना धन दूँगा, उतना ही आप लोगों को भी दूँगा आप लोग यहीं निवास करे” ऐसा अपना मंतव्य प्रकट किया । ते च मुमुक्षवो वैश्वानरमात्मानं जिज्ञास्यमानाः तमेवात्मान- मस्माकं ब्रूहीत्यवोचन् । तदेवं “को न आत्मा किं ब्रह्म ? इति जीवात्मनाऽमात्मभूतं ब्रह्म जिज्ञासमानैः तज्जन्मन्विच्छादिभिः वैश्वा-