श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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प्रतीति होती है। वाजसनेय प्रश्नोपनिषद् के वैश्वानर के प्रकरण में जैसे- वैश्वानर शब्द के साथ अग्नि शब्द का सामानाधिकरण्य अभेद रूप से कहा गया है। प्रस्तुत प्रकरण में भी - "हृदय गार्हपत्याग्नि है, मन अन्वाहार्यपचन है तथा मुख आहवनीय है" वैश्वानर की, हृदय आदि तीन स्थानों में तीनों अग्नियों के रूप में कल्पना की गई है । "जो अन्न पहिले आवे उसका हवन करना चाहिए उस समय वह भोक्ता जो प्रथम आहुति दे उसे" प्राणाय स्वाहा "कहकर दे" इत्यादि में भी प्राणाहुति के आधार रूप से वैश्वानर की ही प्रतीति होती है। तथा वाजसनेय सहिता में इस वैश्वानर आत्मा को जीव शरीर का अभ्यन्तर्वर्त्ती भी कहा गया है—"जो पुरुष के देहान्तर्वर्ती पुरुषाकृति वैश्वानर अग्नि को जानते हैं।" इस प्रकार अग्नि के साथ अभेद रूप से निर्देश, अग्नित्रय रूप से कल्पना, प्राणाहुति की अधिकरणता तथा शरीराभ्यंतर स्थिति आदि से वैश्वानर, जाठराग्नि ही प्रतीति होता है, एकमात्र परमात्मा ही वैश्वानर शब्दाभिधेय नहीं है। तत्र-तथा दृष्ट्युपदेशात्-पूर्वोक्तस्य त्रैलोक्य शरीरस्य परस्य ब्रह्मणो वैश्वानरस्य जाठराग्निशरीरतया तद्विशिष्टस्योपासनो- पदेशात् । अग्निशब्दादिभिर्हि न केवलो जाठरः प्रतिपाद्यते, अपितु जाठराग्नि विशिष्ट. परमात्मा । कथमिदमवगम्यत इति चेत्-- असंभवात् जाठरस्य केवलस्य त्रैलोक्यशरीरत्वासंभवात् । त्रैलोक्य- शरीरतया प्रतिपन्नवैश्वानर समानाधिकरणो जाठर विषयतया प्रतीयमानोऽग्निशब्दो जाठरशरीरतया तद् विशिष्टं परमात्मानमे- वाभिद धतीत्यर्थः । यथोक्तं भगवता- "अहं वैश्वानरोभूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः, प्राणापान समायुक्त. पचाम्यन्नं चतुर्विधम् "इति जाठरानल शरीरो भूत्वेत्यर्थः । अतः तद्विशिष्टस्योपासनमत्रोप- दिश्यते । कि च-पुरुषमपिचैनमधीयते वाजसनेयिनः "स एषोऽग्नि- वैश्वानरो यत्पुरुषः" इति; नहि जाठरस्य केवलस्य पुरुषत्वम्,
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