श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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चोक्तम् । जैमिनिस्त्वाचार्यो वैश्वानर शब्दवदग्निशब्दस्यापि परमात्मन एव साक्षात् अव्यवधानेन वाचकत्वे न कश्चिद् विरोध इति मन्येत । अग्नि शब्द का वैश्वानर के साथ, अभेदभाव निर्दिष्ट होते हुए भी, जाठराग्नि शरीर होने से, तद्विशिष्ट परमात्मा का ही वाचक हो सकता है । वैसे ही परमात्मा के रूप को, उपास्य भी कहा गया है। जैमिनि आचार्य, वैश्वानर शब्द की तरह, अग्नि शब्द का भी, परमात्मा से, साक्षात् संबंध मानते हैं, और वाचकता में कोई विरोध नहीं समझते । एतदुक्तं भवति, यथा वैश्वानर शब्दः साधारणोऽपि परमा- त्माऽसाधारणधर्मविशेषितो विश्वेषां नराणां नेतृत्वादिना गुणेन परमात्मानमेवाभिदधातीति निश्चीयते, एवमग्निशब्दोऽप्यग्रनयना- दिना येनैवगुणेन योगाज्ज्वलने वर्तते, तस्यैव गुणस्य निरुपाधिकस्य काष्ठागतस्य परमात्मनि सम्भवादस्मिन् प्रकरणे परमात्माऽसाधा- रण विशेषितः परमात्मानमेवाभिधत्त इति । जैसे कि वैश्वानर शब्द, साधारण और अविशिष्ट होते हुए भी परमात्मा के असाधारण विशिष्ट धर्मों से, विशेषित होकर, समस्त जीव समुदाय के नेता परमात्मा, का वाचक है; उसी प्रकार “अग्नि” शब्द भी “आगे ले जाने वाला” व्युत्पत्ति के अनुसार नेतृत्व गुणवाला है । परमात्मा का यह स्वाभाविक गुण है; इस प्रकरण में परमात्मा के असाधारण गुणों से विशेषित होने से, वह अग्नि भी परमात्मा बोधक ही है । “यस्त्वेतमेवं प्रादेशमात्रमभिविमानं” इत्यपरिच्छिन्नस्य परस्य ब्रह्मणो द्युप्रभृतिपृथिव्यन्त प्रदेश संबन्धिन्या मात्रया परिच्छिन्नत्वं कथमुपपद्यते ?—तत्राह— शंका की जाती है कि— 'वह प्रादेश मात्र में ही परिमित नहीं है', इस श्रुति वाक्य में कहे गए अपरिच्छिन्न परब्रह्म की, द्युलोक से पृथ्वी पर्यन्त परिणाम परिच्छिन्नता कैसे हो सकती है ? इसका उत्तर देते हैं—