श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४५४ ) "इस वैश्वानर आत्मा का मस्तक ही सुतेजा (द्युलोक) है" इत्यादि श्रुति में भी, द्युलोक आदि रूप मस्तक आदि विशेषणों से विशेषित उस परम पुरुष वैश्वानर को उपासक के शरीर मे, प्राणाहुति के आधार रूप से बतलाया गया है । इसका तात्पर्य है कि- "जो लोग सर्वव्यापी वैश्वानर आत्मा की प्रादेशमात्र में परिमित उपासना करते है" इस श्रुति मे त्रैलोक्य शरीरधारी वैश्वानर परमात्मा की उपासना का उपदेश देकर "सर्वेषु लोकेषु" इत्यादि में-ब्रह्म प्राप्ति रूप, उपासना के फल का उल्लेख करके, "तस्य ह वा एतस्य" इत्यादि में, उपासना के अंगभूत अग्निहोत्र का उपदेश दिया गया है । इसी प्रकार, पहिले जो वैश्वानर का, उपास्य रूप से उपदेश दिया गया है, उनमें भी वैश्वानर के अवयव स्थानीय, सुतेज और विश्वरूपादि नामक आदित्य आदि की, उपासक के शरीर में, मस्तक से पैर तक, अवयवों के रूप में कल्पना की गई है । "मूर्धैव सुतेजः" यह ही परमात्मा का मस्तक स्थानीय द्युलोक है। "चक्षुः विश्वरूपः" अर्थात् उपासक के नेत्र ही, परमात्मा के नेत्र स्थानीय आदित्य है । "प्राण पृथग् वर्त्मा" अर्थात् प्राणवायु ही प्राण है । "संदेहो बहुलः" अर्थात् उपासक का मध्य काय ही परमात्मा का मध्य कायस्थ आकाश है । "पृथिव्येव पादौ" अर्थात् उपासक के पैर ही, परमात्मा की पादरूप पृथिवी है । एवमुपासकः स्वशरीरे परमात्मानं त्रैलोक्यशरीरं वैश्वानरं सन्निहितमनुसंधाय स्वकीयान्युरोलोमहृदयमनआस्यानि प्राणाहुत्या- धारस्य परमात्मनो वैश्वानरस्य वेदिर्बहिगार्हपत्यान्वाहार्यपचाहव- नीयानग्निहोत्रोपकरणभूतान् परिकल्प्य प्राणाहुतेश्चाग्निहोत्रत्वं परिकल्प्यैवं विधानेन प्राणाग्निहोत्रेण परमात्मानं वैश्वानरमाराधये- दिति "उर एव वेदिर्लोमानि बर्हिर्हृदयं गार्हपत्यः" इत्यादिनाेप- दिश्यते । अतः परमात्मा पुरुषोत्तम एव वैश्वानर इति सिद्धम् । इस प्रकार उपासक, त्रैलोक्य शरीर वैश्वानर परमात्मा को अपने ही शरीर में संलग्न मानकर, अनुसंधान करते हुए, अपने वक्ष-लोम-