श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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अन्यान्य वस्तुओं की अपेक्षा अपनी उपास्य वस्तु का समधिक उत्कर्ष बतलाना ही अतिवादिता है। पहिले “नाम” से लेकर “दिक्” तक अन्य जो समस्त पदार्थ, उपास्य बतलाए गए हैं, उनमें अन्यों से, प्राण शब्दवाची जीवात्मा उत्कृष्ट उपास्य है, इसीलिए प्राणविद् अति- वादी कहा गया है। प्राण विद् की अतिवादिता, धर्म आदि पुरुषार्थ से श्रेष्ठ पुरुषार्थ है, परंतु निरतिशय पुरुषार्थ रूप से जो परब्रह्म की उपासना करते हैं, वह उस से श्रेष्ठ हैं; यही अतिवादिता है। यही बात “जो सत्यवादी हैं वह अतिवादी हैं” इत्यादि वाक्य से निश्चित होती है। उक्त वाक्यस्थ “सत्येन” पद में जो तृतीया विभक्ति है, वो “इत्थंभूत” अर्थ ज्ञापन करती है, जिसका तात्पर्य है कि—सत्य रूप से उपासनीय, परब्रह्मोपलक्षित, अतिवादी होता है। शिष्य ऐसी ही प्रार्थना करता है— “हे भगवन ! मैं भी वह सत्योपलक्षित अतिवादी हो सकता हूँ ?” उत्तर में आचार्य कहते हैं—“सत्य ही विशेष रूप से जिज्ञास्य है”। “आत्मनः प्राणः” इत्यादि वाक्य में भी, प्राण शब्द निर्दिष्ट आत्मा की उत्पत्ति बतलाई गई है इससे निश्चित होता है कि—आत्मविद् पुरुष शोक से पार हो जाता है” इत्यादि वाक्य का प्रस्तावित आत्मा, प्राण से, पृथक् है। यदुक्तम्— “अस्ति भगवः प्राणाद्भूयः” इति प्रश्नस्य “अदो वाव प्राणाद्भूयः” इति प्रतिवचनस्य चादर्शनात्प्रक्रांत आत्मोपदेशः प्राणोपदेश पर्यवसानो गम्यत इति, तदयुक्तम्; नहि प्रश्न प्रतिवच- नाभ्यामेवार्थतत्त्वं गम्यते, प्रमाणान्तरेणापि तत्संभवात् । उक्तं च प्रमाणान्तरम् । “अस्ति भगवः प्राणाद्भूयः” इत्यपृच्छतोऽयमभिप्रायः; नामादिष्वाशापर्यन्तेष्वचेतनेषु पुरुषार्थभूयस्तया, पूर्वपूर्वमतिक्रान्तेषु अप्युत्तरोत्तरेषूपदिष्टेषु तत्तद्वेदिनाचार्येणातिवादित्वं नोक्तम् । प्राणशब्द निर्दिष्ट प्रत्यगात्मयाथात्म्यवेदिनस्तु पुरुषार्थभूयस्त्वातिशयं मन्वानेन “स वा एष एवं पश्यन्नेवं मन्वान एवं विजानन्नतिवादी भवति” इति अतिक्रान्तवस्तुवादित्वमुक्तम् । अतोऽत्रैवात्मोपदेशः समाप्त इति मत्वा शिष्योभूयो न पप्रच्छ आचार्यस्त्वेतदपि साति- शयं मत्वा, निरतिश पुरुषार्थभूतं सत्य शब्दाभिधेयं परं ब्रह्म “एष तु