श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४७६ ) परमात्मेत्यन्तर्यामिब्राह्मणादिषूक्तम् । अतः प्रत्यगर्थस्य परमात्मपर्यव- सानाद् अहंशब्दोऽपि परमात्मपर्यव सायीति प्रत्यगात्मशरीरकत्वेन परमात्मानुसंधानार्थोऽयं अहंग्रहोपदेशः परमात्मनः सर्वशरीरतया सर्वात्मत्वात् प्रत्यगानोऽप्यात्मा परमात्मा । तदेव “अथात आत्मो- पदेशः” इत्यादिना” आत्मैवेदंसर्वम्” इत्यन्तेनोच्यते । “अहमेवाधस्तात्” इत्यादि मे जो सर्वात्मकता बतलाई गई है— वह भूमाविशिष्ट ब्रह्म की अन्तर्यामी रूप अहं की उपासना की, द्योतिका है । “अथातोऽहंकारादेशः” इत्यादि श्रुति मे, उक्त अहं क्या है ? इत्यादि उपदेश का उपक्रम किया गया है । अन्तर्यामी (बृहदारण्यकोपनिषद के प्रथम) ब्राह्मण मे, परमात्मा को, जीवान्तर्यामी कहा गया है, इसलिए, जीवात्मा का पर्यवसान, परमात्मा मे होने से, अहं शब्द भी परमात्मा मे ही, पर्यवसित होता है । जीवात्मा परमात्मा का शरीर है, इसलिए शरीरी परमात्मा के अनुसंधान के लिए, अहं शब्द का प्रयोग किया गया है । सारा जगत् परमात्मा का ही शरीर है, परमात्मा ही सबके आत्मा हैं इस प्रकार जीवात्मा के आत्मा भी, परमात्मा ही हैं, ऐसा—“अथात आत्मोपदेशः” से लेकर “आत्मैवेदं सर्वम्” तक बतलाया गया है । एतदेवोपपादयितुं प्रत्यगात्मनोऽप्यात्मभूतात् परमात्मनः सर्व- स्योत्पत्तिरुच्यते “तस्य ह वा एतस्यैवं पश्यत् एवं मन्वानस्यैवं विजानत आत्मतः प्राण आत्मत आकाशः” इत्यादिना । उपासक- स्यान्तर्यामितया अवास्थितात् परमात्मनः सर्वस्योत्पत्तिरित्यर्थः । अतः परमात्मनः प्रत्यगात्म शरीरत्वज्ञानप्रतिष्ठार्थमहंग्रहोपासनं कर्त्तव्यम् । तस्माद् भूमविशिष्टः परमात्मेति सिद्धम् । उक्त तत्त्व के समर्थन के प्रसंग में-जीवात्मा के भी, आत्मरूप परमात्मा से, समस्त की उत्पत्ति इस प्रकार बतलाई गई है-“इस प्रकार दर्शन-श्रवण-मनन और विज्ञान संपन्न आत्मा से प्राण एवं आकाश हुए” इत्यादि । अर्थात् उपासक के अन्तर्यामी रूप से स्थित परमात्मा से, ankurnagpal108@gmail.com