भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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४५ (चतुर्थ अध्याय) (प्रथम पाद) १. आवृत्त्यधिकरण (सूत्र १-२) १. ब्रह्म प्राप्ति की उपाय उपासना के एक बार अनुष्ठान मात्र से फलप्राप्ति संभावना प्रदर्शन। २. जीवन पर्यन्त उपासना की कर्त्तव्यता निरूपण, अनुकूल प्रमाणों के आधार पर उक्तसिद्धान्त का निरूपण। —पृ०१११७-२० २. आत्मत्वोपासनाधिकरण (सूत्र ३) १. पूर्वपक्ष—आत्मरूप से ब्रह्म की उपासना का निषेध। २. (सिद्धान्त)—आत्मभाव से उपासना की कर्त्तव्यता का निरूपण। —पृ०११२०-२३ ३. प्रतीकाधिकरण (सूत्र ४-५) १. पूर्वपक्ष--मन आदि प्रतीक की आत्मारूप से उपासना का समर्थन। २. (सिद्धान्त) मन आदि प्रतीक की आत्मारूप से उपासना का खंडन मन आदि प्रतीक में ब्रह्मदृष्टि की कर्त्तव्यता का प्रतिपादन। —पृ०११२३-२४ ४. आदित्यादिमत्याधिकरण (सूत्र ६) १. पूर्वपक्ष—कर्मांग उद्गीथ आदि की उपासना में आदित्य आदि में उद्गीथादि दृष्टि कर्त्तव्यता का निरूपण। २. (सिद्धान्त)—कर्मांग उद्गीथ आदि में आदित्य दृष्टि का समर्थन। —पृ०११२४-२५ ५. आसीनाधिकरण (सूत्र ७-११) आसनविशेष में ही उपासना करने का उपपादन। ध्यानात्मक उपासना में आसन की अनिवार्यता ज्ञापन। उपासना की स्थिरतासापेक्षता का प्रतिपादन। उपासना में एकाग्रता के अनुकूल देश, काल की प्रयोजनीयता का समर्थन। —पृ०११२५-२७ ankurnagpal108@gmail.com