श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ प्रथम अध्याय ] चतुर्थ पाद १. आनुमानिकाधिकरणः- आनुमानिकमप्येकेषामितिचेन्न शरीररूपकविन्यस्तगृहीतेर्दर्शयति च ।१।४।१।। उक्तं परमपुरुषार्थलक्षणमोक्षसाधनतया जिज्ञास्यं जगज्जन्मादि कारणं ब्रह्मचिद्वस्तुनः प्रधानादेश्चेतनाच्च बद्धमुक्तोभयावस्थाद् विलक्षणं निरस्त समस्तहेयगंध सर्वज्ञं सर्वशक्ति सत्यसंकल्पं समस्त कल्याण गुणात्मकं सर्वान्तरात्मभूतम् निरंकुशैश्वर्यम् इति । इदानीं कपिलतंत्रसिद्धा ब्रह्मात्मक प्रधान पुरुषादि प्रतिपादन मुखेन प्रधान कारणत्व प्रतिपादनच्छायानुसारोष्यपि कानिचिद्वाक्यानि कासु- चिच्छाखासु संतीत्याशंक्य ब्रह्मैककारणत्वस्थेम्ने तन्निराक्रियते । तृतीय पाद तक, मोक्षसिद्धि के उपाय रूप से जिज्ञास्य, जगत् की सृष्टि आदि के कारण, प्रधान आदि अचेतन तथा बद्धमुक्त-अवस्था वाले चेतन जीवात्मा से विलक्षण, समस्त हीनता से रहित, सर्वज्ञ, सर्वशक्ति, सत्यसंकल्प, समस्त कल्याण गुणात्मक, सर्वान्तर्यामी, सर्वतंत्र स्वतंत्र परम पुरुषार्थ स्वरूप पर ब्रह्म, का विवेचन किया गया हैं। अब अनीश्वर- वादी कपिल के सांख्यशास्त्र के प्रतिपाद्य प्रधान पुरुष में जो, प्रधान तत्त्व है उसका श्रुतियों में कुछ अंशों में, छायारूप से प्रतिपादन प्रतीत होता है, अतः वही जगत का कारण है, ऐसी आशंका करते हुए, ब्रह्मकारणवाद का दृढ़ता से संपादन करते हुए, उक्त आशंका का निराकरण करेंगे । कठवल्लीष्वाम्नायते- “इन्द्रियेभ्यः पराह्यर्था अर्थेभ्यश्च परंमनः, मनसस्तु पराबुद्धिः बुद्धेरात्मामहान् परः, महतः परमव्यक्तमव्यक्तात् पुरुषः परः पुरुषान्न परं किंचित् सा काष्ठा सा परागतिः ।” इति, ankurnagpal108@gmail.com