भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

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( ५७६ ) पृथक्ता है। इन पंच संख्याविशेषित पांच जनों की सांख्योक्त तत्त्वों से पृथक्ता दिखलाई गई है। यत् शब्द निर्दिष्ट ब्रह्म के आश्रित होने से, इन तत्त्वों की ब्रह्मात्मकता प्रतीत होती है। “उसको ही आत्मा मानकर जो अमृत स्वरूप ब्रह्म को जानते हैं, वे अमर हो जाते हैं” इस वाक्य में प्रयुक्त तत् शब्द से यत् शब्द निर्दिष्ट ब्रह्म का ही निर्देश किया गया है। इससे स्पष्ट है कि-पंचजन सांख्योक्त तत्त्व से पृथक् हैं। इसमें जो तत्त्व बतलाये गए हैं वे सांख्य तत्त्वों से संख्या में अधिक भी हैं। यत् शब्द निर्दिष्ट आत्मा और आकाश ये दो सांख्य तत्त्व से अधिक हैं। “उन्हें कुछ लोग छब्बीस तथा कुछ सत्ताइस तत्त्वों वाला कहते हैं” ऐसे श्रुति प्रसिद्ध, समस्त तत्त्वों के आश्रय सर्वेश्वर परब्रह्म पुरुषोत्तम ही उक्त श्रुति के प्रतिपाद्य हैं। सूत्रस्थ अपि शब्द यह निर्देश कर रहा है कि—“पंच-पंचजनाः” पद से पच्चीस तत्त्वों की प्रतीति कदापि संभव नहीं है। क्योंकि पांच-पांच समूहों का व्यवस्थित रूप से आरंभ करना संभव नहीं है। सांख्योक्त तत्त्वों की पांच-पांच संख्यावाली कोई सुनियोजित पद्धति नहीं है। ऐसा नहीं कह सकते कि-पंच कर्मेन्द्रिय, पंच महाभूत, पंच तन्मात्रा और पंच अवशिष्ट (महत्, अहंकार, प्रकृति, मन, पुरुष) ऐसी क्रमबद्ध शृंखला है, क्योंकि-वाक्य में जो आकाश का पृथक् निर्देश किया गया है, उससे पंचमहाभूत समूह असिद्ध हो जाता है। यह “पंचजनाः” पद समाहार समस्त पद नहीं है अपितु “दिक् संख्ये संज्ञायाम्” सूत्र के अनुसार संख्यावाची है। यदि ऐसा न होता तो इस पद में लिंगविपर्यय अवश्य हो जाता (अर्थात् पंचजनी होता), “पंच पंचजनाः” वाक्य “सप्त सप्तर्षयः” की तरह संख्यावाची ही है। के पुनस्ते पंचजनाः ? इत्यत आह— तो फिर वे पांच कौन हैं ? इसका उत्तर देते हैं— प्राणादयो वाक्यशेषात् । १।४।१२॥ “प्राणस्य प्राणमुत चक्षुषश्चक्षुः श्रोत्रस्य श्रोत्रं अन्नस्यान्नं मनसो ये मनो विदुः” इति वाक्यशेषात् ब्रह्माश्रयाः प्राणादय एव पंचपंचजनाः इति विज्ञायन्ते । ankurnagpal108@gmail.com