श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५८२ ) का एक साथ निर्देश किया गया है । "पंच पंचजनाः" इत्यादि का तात्पर्य है कि--पंचशब्द निर्दिष्ट पांच इन्द्रियाँ और आकाश शब्द निर्दिष्ट आकाशादि पंच महाभूत, ब्रह्म में अधिष्ठित है। इस प्रकार समस्त तत्त्वो के ब्रह्माश्रयत्व प्रतिपादन से ही यह निश्चित हो जाता है कि सांख्य तंत्र सिद्ध तत्त्वो की उक्त मंत्र में चर्चा नहीं है। संख्या का ग्रहण हो न हो, वेदांत वाक्यों में कहीं भी, कपिल तंत्र सिद्ध तत्त्वों की प्रतीति ही नही होती, यह निश्चित है। ४ कारणत्वाधिकरण :— कारणत्वेन चाकाशादिषु यथाव्यपदिष्टोक्तेः १।४।१४॥ पुनः प्रधान कारणवादी प्रत्यवतिष्ठते–न वेदांतेषु एकस्मात् सृष्टिराम्नायत इति, जगतो ब्रह्मैककारणत्वं न युज्यते इति । कथम् ? तथाहि–“सदेव सोम्येदमग्र आसीत्” इति सत्पूर्विका सृष्टिराम्नायते, “असद् वा इदमग्र आसीत्” इत्यसत् पूर्विका च, अन्यत्र “असदेवेदमग्र आसीत्तत्सदासीत्तत्समभवत्” इति च । अतो वेदांतेषु स्रष्टुरव्यवस्थितेर्जगतो ब्रह्मैककारणत्वं न निश्चेतुं शक्यम्, प्रत्युत प्रधानकारणत्वमेव निश्चेतुं शक्यते । प्रधान-कारणवादी पुनः सामने आते हैं, वे कहते हैं कि वेदांत वाक्यों में केवल एक से ही सृष्टि नहीं बतलाई गई है, इसलिए जगत का कारण एक मात्र ब्रह्म ही है, ऐसा कहना उपयुक्त नहीं है। देखें—"पहिले यह जगत् सत् स्वरूप ही था" इसमे सत्पूर्विका सृष्टि तथा—"पहिले यह जगत असद् रूप ही था" इसमें असत्पूर्विका सृष्टि का वर्णन मिलता है तथा "यह जगत् पहिले असत् ही था, वही सत् था, वही संभूत हुआ" ऐसा उभयात्मक भी वर्णन मिलता है। इस प्रकार वेदांत वाक्यों में सृष्टिकर्त्ता के विषय में जो अव्यवस्थित वर्णन मिलता है, उससे एकमात्र ब्रह्म को ही जगत् की सृष्टि का निश्चित कारण नहीं कह सकते, अपितु प्रधान को ही निश्चित रूप से जगत का कारण कह सकते हैं।