श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५८४ ) शक्यते, कुतः ? आकाशादिषु कारणत्वेन यथाव्यपदिष्टस्योक्तेः, सर्वज्ञत्वादि विशिष्टत्वेन “जन्माद्यस्य यतः” इ त्येवमादिषु प्रतिपादितं ब्रह्म यथा व्यपदिष्टमित्युच्यते, तस्यैकस्यैवाकाशादिषु कारणत्वेनोक्तेः । “तस्माद् वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः” “तत्तेजोऽसृजत्” “इत्यादिषुसर्वज्ञं ब्रह्मैव कारणत्वेनोच्यते । तथाहि “सत्यंज्ञानमनंतं ब्रह्म” “सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चिता” इति प्रकृतं विपश्चिदेव ब्रह्म तस्माद् वा एतस्मादिति परामृश्यते। तथा-“तदैक्षत् बहुस्याम्” इतिनिर्दिष्टं सर्वज्ञं ब्रह्मैव “तत्तेजोऽसृजत्” इति परामृश्यते । एवं सर्वत्र सृष्टि वाक्येषु द्रष्टव्यम् अतोब्रह्मैक कारणं जगदिति निश्चीयते । उन सांख्यवादियों के कथन पर सूत्रकार सिद्धान्त रूप से “कारण- त्वेन चाकाशादिषु” इत्यादि सूत्र प्रस्तुत करते हैं। सूत्र में च शब्द तु शब्द वाची है। सर्वज्ञ, सर्वेश्वर, सत्य संकल्प, निर्दोष परब्रह्म से ही जगत् की सृष्टि हुई है ऐसा निश्चित कह सकते हैं। क्योंकि-आकाशादि में कारण रूप से ब्रह्म का ही उल्लेख किया गया है। “जन्माद्यस्य यतः” सूत्र में सर्वज्ञ आदि गुणविशिष्ट रूप से प्रतिपादित ब्रह्म ही, यथाव्यपदिष्ट रूप से कहा गया है, आकाशादि में एकमात्र उसी को कारण बतलाया गया है। “उसी से आकाश हुआ, उसने तेज की सृष्टि की” इत्यादि में ब्रह्म को ही कारण बतलाया गया है। उसी प्रकार--“ब्रह्म सत्य ज्ञान अनंत स्वरूप है” “वह सर्वदर्शी, ब्रह्म के साथ समस्त कामनाओं को भोगता है” इत्यादि में जिस सर्वज्ञ ब्रह्म का वर्णन किया गया है, “तस्माद् वा एतस्माद्” में उसी का उल्लेख है। “उसने सोचा बहुत हो जाऊँ” इत्यादि में निर्दिष्ट सर्वज्ञ ब्रह्म का ही “उसने तेज की सृष्टि की” इत्यादि में उल्लेख है। इसी प्रकार सभी जगह सृष्टि परक वाक्यों में देखना चाहिए। इससे निश्चित होता है कि--जगत् का एकमात्र कारण ब्रह्म ही है। ननु “असद् वा इदमग्र आसीत्” इत्यसदेव कारणत्वेन