श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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( शब्द लब्ध ) अर्थ ग्राह्य होता है इसलिए यहाँ कर्म में षष्ठी विभक्ति मानते हैं। "प्रतिपद ( कर्म विहित ) षष्ठी विभक्ति में समास नहीं होता" इस नियमानुसार यहाँ समास निषेध की शंका भी नहीं की जा सकती, क्योंकि "कृद्योगे षष्ठी समस्यते" इस नियम से कृत् प्रत्यय के योग में विहित षष्ठी के साथ समास का पुनः विधान किया गया है। ब्रह्मशब्देन च स्वभावतो निरस्तनिखिलदोषोऽनवधिकातिशया- संख्येयकल्याणगुणगणः पुरुषोत्तमोऽभिधीयते, सर्वत्र बृहत्त्वगुणयोगेन हि ब्रह्मशब्दः, बृहत्त्वं च स्वरूपेण गुणैश्च यत्रानवधिकातिशयं सोऽस्य मुख्योऽर्थः । स च सर्वेश्वर एव, अतो ब्रह्मशब्दस्तत्रैव मुख्यवृत्तः । तस्मादन्यत्र तद्गुणलेशयोगादौपचारिकः, अनेकार्थकल्पनायोगाद् भगवच्छब्दवत् । तापत्रयातुरैरमृतत्वाय स एव जिज्ञास्यः । अतस्सर्वेश्वर एव जिज्ञासाकर्मभूतं ब्रह्म । ब्रह्म शब्द से स्वभावतः समस्त दोषों से रहित, निरवधि, असंख्येय, कल्याणमय गुणों से युक्त पुरुषोत्तम कहे गये हैं। ब्रह्म शब्द सभी जगह "बृहत्त्व" गुणवाला कहा गया है। स्वरूपतः और गुणानुसार असीमता और अतिशयिता ही बृहत्त्व का सही अर्थ है। उक्त विशेषताओं से युक्त सर्वेश्वर ही हैं, इसलिए ब्रह्म शब्द से वे ही अभिहित हैं । उक्त गुणों से आंशिक संबंध होने से अन्यों के लिए प्रयुक्त ब्रह्म शब्द भगवत् शब्द की तरह औपचारिक मात्र है। त्रितापों से तप्त और आतुर संसारी जीवों को अमरता और शांति प्राप्त करने के लिए वह सर्वेश्वर ही जिज्ञास्य हैं। जिस ब्रह्म की जिज्ञासा की जाती है वह सर्वेश्वर ही हैं। ज्ञातुमिच्छा जिज्ञासा । इच्छाया इष्यमाणप्रधानत्वादिष्य- माणं ज्ञानमिह विधीयते । मीमांसापूर्वभागज्ञातस्य कर्मणोऽल्पा- स्थिरफलत्वादुपरितनभागावसेयस्य ब्रह्मज्ञानस्यानन्ताक्षय फलत्वं च पूर्ववृत्तात् कर्मज्ञानादनन्तरं तत एव हेतोर्ब्रह्म ज्ञातव्यमित्युक्तं भवति । तदाह वृत्तिकारः—"वृत्तात्कर्माधिगमादनन्तरं ब्रह्म- विविदिषा" इति ।