भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

पृष्ठ 673, कुल 696 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 673

( ६१३ ) यति स त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः”— योऽक्षरमंतरे संचरन् यस्याक्षरं शरीरं यमक्षरं न वेद एष सर्वभूतान्तरात्माऽपहतपाप्मा दिव्यो देव एको नारायणः”— श्रन्तः प्रविष्टः शास्ताजनानां सर्वात्मा” इति स्वशरीरभूते जीवात्मन्यात्मतयाऽवस्थिते जीव शब्देन ब्रह्म प्रतिपाद- नमितिकाशकृत्स्न आचार्यो मन्यतेस्म । अतः “जीवात्मा के स्वरूप में प्रवेश करके” जो आत्मा में स्थित रहते हुए भी आत्मा से पृथक् है आत्मा जिसको नहीं जानता, आत्मा ही जिसका शरीर है जो कि आत्मा को नियमित करता है, वही तुम्हारा अन्तर्यामी अमृत स्वरूप आत्मा है “जो अक्षर ( जीव ) में संचरण करता है, अक्षर ही जिसका शरीर है अक्षर जिसे नहीं जानता ऐसा सर्वान्तर्यामी निष्पाप दिव्य देव एकमात्र नारायण ही है” सबका आत्मस्वरूप परमेश्वर अन्तर्यामी शासक है” इत्यादि श्रुतियों में, अपने ही शरीररूप जीवात्मा में आत्मा रूप से उनकी स्थिति बतलाई है, इसीलिए जीवात्म- वाची शब्दों से परमात्मा का वर्णन किया गया है। ऐसा काशकृत्स्न आचार्य का अभिमत है। जीवशब्दश्च जीवस्य परमात्मपर्यन्तस्यैव वाचको न , जीवमा- त्रस्येति पूर्वमेवोक्तम् “नामरूपे व्याकरवाणि” इत्यत्र । एवमात्म- शरीरभावेन तादात्म्योपपादने परस्य ब्रह्मणोऽपहतपाप्मत्वसर्वज्ञ- त्वादिगोचरा जीवस्याविदुषः शोचतो ब्रह्मोपासनान् मोक्षवादिन्यो जगत्सृष्टिप्रलयाभिधायिन्यो जगतो ब्रह्मतादात्म्योपदेशपराश्च सर्वाः श्रुतयः सम्यगुपपादितां भवेतीति काशकृत्स्नीयंमतं सूत्रकारः स्वीकृतवान् । जीव शब्द, जीव के परमात्मभाव तक का वाचक है केवल, जीवभाव मात्र का ही वाचक नहीं है, ऐसा “नामरूपे व्याकरवाणि” के प्रसंग में भी बतला चुके हैं। इस सिद्धान्त के अनुसार, परमात्मा के शरीर रूप जीवात्मा के साथ, तादात्म्य भाव स्थिर होता है। परब्रह्म के ankurnagpal108@gmail.com

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक) · पृष्ठ 673, कुल 696 में से · BharatKosha