भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( ६३५ ) "मायाधीश इस प्रकृति से, इस विश्व की सृष्टि करते हैं, और दूसरा (जीव) माया द्वारा इस सृष्टि में बाना जाता है" इत्यादि में यह बतलाया गया है कि-ब्रह्म के जगदाकार रूप में विकृत होने पर उनका जितना भी विकार है वह तो सारा का सारा उनके शरीर स्थानीय अचेतनांश मे प्रतिष्ठित रहता है, तथा जो कुछ अपुरुषार्थ (परिहार्य अनर्थ) है वह परमात्मा के ही शरीर स्थानीय क्षेत्रज्ञ (जीव) में रहता है । इस बात को स्पष्ट करने के लिए ही, ब्रह्म की शरीर भूत अवर्णनीय अतिसूक्ष्म अवस्था वाली वस्तु प्रकृति और पुरुष को ब्रह्मात्मक होते हुए, भी, भिन्न बतलाया गया है । ऐसा मानने से ही “उन्होंने स्वयं अपने को जगद् रूप में परिणत किया" इत्यादि वाक्यों का सामंजस्य हो सकता है । ऐसा ही मनुजी का भी वचन है-“उन्होंने अपने शरीर से विविध प्रजा की सृष्टि की इच्छा से सर्व प्रथम जल की सृष्टि की और उसमें वीर्य का रोपण किया ।” इस प्रकार ब्रह्म की निर्दोषता और निर्विकारता श्रुतियों से सिद्ध होती है । ब्रह्म ही जगत के निमित्त और उपादान कारण हैं । योनिश्च हि गीयते ।१।४।२८। इतश्च जगतोनिमित्तमुपादानं च ब्रह्म, यस्माद् योनित्वेनाप्य- भिधीयते “कर्त्तारमीशं पुरुषं ब्रह्म योनिम्” इति । “यद्भूतयोनिं परिपश्यन्ति धीराः” इति च योनिशब्दश्चोपादानवचन इति । “यथोर्णनाभिः सृजते गृह्णते च” इति वाक्यशेषादवगम्यते । इसलिए भी, ब्रह्म, जगत के निमित्त और उपादान कारण हैं कि परमात्मा को सब की योनि बतलाया गया है । "जगत कर्त्ता पुरुष, योनि स्वरूप ब्रह्म को” “उस भूत योनि को साधक लोग दर्शन करते हैं' इत्यादि में उन्हें योनि शब्द से निर्देश किया गया है "जैसे कि मकड़ी सृजन और ग्रहण करती है" इत्यादि वाक्यशेष से, उसकी उपादानता भी ज्ञात होती है । ८ सर्वव्याख्यानाधिकरणः- एतेन सर्वे व्याख्याताः व्याख्याताः ।१।४।२९॥ ankurnagpal108@gmail.com