श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
पृष्ठ 80, कुल 696 में से
संदर्भ में पढ़ें( १८ ) निर्णीतम्। “उपासनं स्याद् ध्रुवानुस्मृतिदर्शनान्निर्वचनाच्च” इति। तस्यैव वेदनस्योपासनरूपस्यासकृदावृत्तस्य ध्रुवानुस्मृतित्वमुप- वर्णितम्। तैल धारा की तरह अखंड प्रवाहमयी स्मृति परम्परा ही ध्यान है। “स्मृति के आश्रय से हृदयस्थ समस्त ग्रन्थियाँ भंग हो जाती हैं।” इस वाक्य में ध्रुवा स्मृति को मोक्ष का उपाय बतलाया गया है। वह स्मृति आत्मदर्शन के समान रूप वाली है, “उस परावर सर्वोत्तम पुरुष का दर्शन करके हृदयस्थ ग्रन्थियों का मोचन, संशयों का उच्छेद तथा कर्मों का क्षय हो जाता है” इस वाक्य से स्मृति और दर्शन की एकार्थता सिद्ध होती है। इसी प्रकार “आत्मा वा अरे” इत्यादि वाक्य से निदिध्यासन की दर्शन रूपता दिखलायी गयी है। स्मृति भावना के प्रकर्ष से इसकी दर्शन रूपता होती है। वाक्यकार ने इस सबका विस्तृत विवेचन इस प्रकार किया है—“वेदन ही उपासना है ऐसा श्रुति से ही ज्ञात होता है।” सभी उपनिषदों में मोक्ष के उपाय रूप से विहित “वेदन” को ही “उपासना” रूप बतलाया गया है। प्रयाजादि याग की तरह ज्ञानानु- शीलन भी एक बार करना चाहिए” इस वाक्य को पूर्वपक्ष के रूप में उद्धृत करके “सिद्धन्तूपासनशब्दात्” इस सूत्र से “वेदन” की प्रवाहमयी आवृत्ति का मोक्ष साधन के रूप में निर्णय किया गया है। तथा “उपासनं स्याद् ध्रुवानुस्मृतिर्दर्शनान्निर्वचनाच्च” इस सूत्र से उस उपासना रूप वेदन की प्रवाहमयी आवृत्ति को ध्रुवा स्मृति बतलाया गया है। सेयं स्मृतिर्दर्शनरूपा प्रतिपादिता, दर्शनरूपता च प्रत्यक्षता- पत्तिः। एवं प्रत्यक्षतापन्नामपवर्गसाधनभूतां स्मृतिं विशिनष्टि— “नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन। यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्॥” इति। अनेन केवलश्रवणमनननिदिध्यासनानामात्मप्राप्त्यनुपायत्वमुक्त्वा “यमेवैष आत्मा वृणुते तेनैव लभ्यः” इत्युक्तम्। उक्त स्मृति की दर्शन रूपता का प्रतिपादन किया गया है, दर्शन रूपता को ही साक्षात्कार कहते हैं। ऐसी साक्षात्कार रूपता को प्राप्त