श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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तदेकं पश्यति ।”, “न मृत्यो मृत्युं पश्यति ।”, “यदा हि एवैष एतस्मिन्न- दृश्येऽनात्म्येऽनिरुक्तेऽनिलयनेऽभयं प्रतिष्ठां विन्दते अथ सोऽभयं गतो भवति ॥”, “भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः । क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे ॥”, “ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति ।”, “तमेवं विदित्वाति मृत्युमेति नान्यः पन्थाः ।” इत्याद्याः श्रुतयः । अत्र मृत्युशब्देन अविद्याऽभिधीयते । यथा सनत्सुजातवचनम्—“प्रमादं वै मृत्यु- महं ब्रवीमि सदाऽप्रमादममृतत्वं ब्रवीमि ।” इति । “सत्यं ज्ञान- मनन्तं ब्रह्म ।” “विज्ञानमानन्दं ब्रह्म।” इत्यादि शोधकवाक्यावसेयनि- र्विशेषस्वरूपब्रह्मात्मैकत्वविज्ञानं च । “अथ योऽन्यां देवतामुपास्तेऽ- न्योऽसावन्योऽहमस्मीति न स वेद ।”, “अकृत्स्नो हि एष आत् त्येवे.- पासीत ।”, ‘तत्त्वमसि ।”, “त्वं वा अहमस्मि भगवो देवते अहं वै त्व- मसि भगवो देवते तद् योऽहं सोऽसौ योऽसौ सोऽहमस्मि ।” इत्यादि- वाक्यसिद्धम् । वक्ष्यति च एतदेव—“आत्मेति तूपगच्छन्ति ग्राहयन्ति च” इति । तथा च वाक्यकारः—“आत्मेत्येव तु गृह्णीयात् सर्वंस्य तन्निष्पत्तेः ।” इति अनेन च ब्रह्मात्मैकत्वविज्ञानेन मिथ्यारूपस्य सकारणस्य बन्धस्य निवृत्तिरुक्ता । जैसा कि--“यह अनंत भगवान् ज्ञानस्वरूप हैं, वस्तुरूप नहीं, इसलिए शैल, सागर, पृथिवी आदि भेदों को विज्ञान का स्फुरण मात्र समझो । जब समस्त कर्म और उनके संस्कारों का क्षय हो जाता है तभी शुद्ध ( अविद्या रहित ), निर्दोष ( रागादिशून्य ), भेददृष्टि रहित ज्ञान का अपना वास्तविक रूप प्रकट होता है । इस निर्दुष्ट स्थिति में कल्पना रूपी वृक्ष के वस्तुभेदमय फल आदि का उद्गम नहीं होता । विज्ञान के अतिरिक्त कहीं भी कुछ नहीं है, अपने अपने कर्मों के भेद से जीव, एक विज्ञान को अनेक रूपों में देखते हैं । विशुद्ध, विमल, शोक लोभादि रहित, सदा एक, ज्ञान स्वरूप वे वासुदेव ही एक मात्र तथ्य हैं, उनके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है । ज्ञान ही सत्य है और सब कुछ असत्य है, ऐसे सत्य तथा जागतिक व्यवहारों का मैं तुम्हें उपदेश देता हूँ ।” इत्यादि श्रुतियों