श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 7/75-87 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
भी तब वहाँ आ पहुँचे। सबको साथ लेकर महाप्रभु आलालनाथ आ गये और उनको प्रणाम करके उनकी बहुत स्तव-स्तुति की। प्रेमावेशमें महाप्रभुने कुछ देर तक नृत्य-गीत किया और वहाँ रहनेवाले सभी लोग उनके दर्शनके लिये आये॥ 75-77 ॥ अनुभाष्य—'साथ'—सङ्ग या साथ॥ 75॥
महाप्रभुके दर्शनोंके लिये बहुत लोगोंका आगमन और हरि-सङ्कीर्तन :— चौदिकेते सब लोक बले 'हरि' 'हरि'। प्रेमावेशे मध्ये नृत्य करे गौरहरि ॥ 78 ॥ काञ्चन-सदृश देह, अरुण वसन। पुलकाश्रु-कम्प-स्वेद ताहाते भूषण ॥ 79 ॥ देखिते लोकेर मने हैल चमत्कार। यत लोक आइसे, केह नाहि याय घर ॥ 80 ॥ केह नाचे, केह गाय, 'श्रीकृष्ण' 'गोपाल'। प्रेमेते भासिल लोक, स्त्री-वृद्ध-आबाल ॥ 81 ॥ देखि' नित्यानन्द प्रभु कहे भक्तगणे। “एइरूपे नृत्य आगे हबे ग्रामे ग्रामे ॥” 82 ॥
अनुवाद—चारों ओर सब लोक 'हरि' 'हरि' बोलने लगे और उनके बीचमें श्रीगौरहरि प्रेमाविष्ट होकर नृत्य कर रहे थे। स्वर्णके समान महाप्रभुकी देह और उसके ऊपर अरुण वर्णके वस्त्र थे तथा पुलक, अश्रु, कम्प, स्वेदादि अष्ट-सात्त्विकभाव उनके भूषणस्वरूप थे। महाप्रभुके ऐसे अद्भुत रूप और भावोंको देखकर लोगोंका मन चमत्कृत हो रहा था और कोई भी अपने घर लौटना नहीं चाह रहा था। कुछ लोग नृत्य कर रहे थे, कुछ लोग 'श्रीकृष्ण' 'गोपाल' नामका सङ्कीर्तन कर रहे थे। इस प्रकार बालक-स्त्री-वृद्ध, सभी प्रेममें डूब रहे थे। यह देखकर श्रीनित्यानन्द प्रभुने भक्तोंसे कहा कि अब तो गाँव-गाँवमें जहाँ महाप्रभु जायेंगे, इसी प्रकार नृत्य होगा॥” 78-82 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 7/25 संख्या देखें ॥ 81 ॥
महाप्रभुको छोड़नेकी लोगोंमें अनिच्छा देखकर प्रसाद पवानेके छलसे महाप्रभुको वहाँसे हटाना :— अतिकाल हैल, लोक छाड़िया ना याय। तबे नित्यानन्द-गोसाञि सृजिल उपाय ॥ 83 ॥ मध्याह्न करिते गेला प्रभुके लञा। ताहा देखि' लोक आइसे चौदिके धाञा ॥ 84 ॥
भक्तोंका मन्दिरके भीतर प्रवेश :— मध्याह्न करिते आइला देवता-मन्दिरे। निजगण प्रवेशि' कपाट दिल बहिर्द्वारे ॥ 85 ॥
अनुवाद—श्रीनित्यानन्द गोसांईने देखा कि बहुत समय हो गया है, तो उन्होंने एक उपाय निकाला जिससे लोग महाप्रभुको छोड़ दें। वे महाप्रभुको दोपहरका स्नान करानेके लिये ले चले, ऐसा देखकर लोग चारों ओरसे दौड़कर उधर ही आने लगे। दोपहरका स्नान करनेके बाद वे वापिस मन्दिरमें आ गये। श्रीनित्यानन्द प्रभुने अपने साथ आये लोगोंको प्रवेश करवाके बाहरका द्वार बन्द कर दिया ॥ 83-85 ॥ अनुभाष्य—'अतिकाल'—अधिक समय व्यतीत हो जानेपर ॥ 83 ॥
श्रीगोपीनाथके द्वारा महाप्रभुको भिक्षा प्रदान; भक्तोंको महाप्रभुके अवशेषकी प्राप्ति :— तबे दुइ प्रभुरे गोपीनाथ भिक्षा कराइल। प्रभुर शेष प्रसादान्न सबे बाँटि' खाइल ॥ 86 ॥
अनुवाद—तब श्रीगोपीनाथाचार्यने महाप्रभु एवं श्रीनित्यानन्द प्रभु, दोनोंको भोजन कराया और उनके उच्छिष्ट अन्न-प्रसादको सब भक्तोंने बाँटकर खा लिया ॥ 86 ॥
मन्दिरके बाहर महाप्रभुके दर्शनोंके लिये अनेक लोगोंका समागम :— शुनि' शुनि' लोक-सब आसि' बहिर्द्वारे। 'हरि' 'हरि' बलि' लोक कलरव करे ॥ 87 ॥
अनुवाद—महाप्रभुके आगमनकी बातको सुनकर
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