श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1125, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंआठवाँ अध्याय 8/97-126 ] आदिलाला 4/68-97 और 122-143, 214-219, 239-262 संख्या देखें॥ 97-115 ॥ वक्ता श्रीरायके समक्ष श्रोतारूपी महाप्रभुका शिष्यत्व अभिमान :- प्रभु कहे,—“ये लागि' आइलाम तोमा-स्थाने। सेइ सब तत्त्ववस्तु हैल मोर ज्ञाने ॥ 116 ॥ अब महाप्रभुका श्रीकृष्णभजन-क्रमका श्रवण :- एबे जानिलुँ साध्य-साधन-निर्णय। आगे आर आछे किछु, शुनिते मन हय ॥ 117 ॥ अनुवाद—महाप्रभु बोले,-“राय! जिस कार्यके लिये मैं आपके पास आया था, उन सभी तत्त्व-वस्तुओंका ज्ञान मुझे आपसे प्राप्त हो गया। अब मैंने साध्य-साधन तत्त्वका निर्णय जान लिया। तथापि मुझे लगता है कि इससे भी आगे कुछ है, और उसे सुननेकी मेरे मनमें इच्छा है॥ 116-117 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 8/1 श्लोक देखें। 'साध्य-साधन-निर्णय'के पाठान्तरमें- 'सेव्य-साधन-निर्णय' ॥ 116-117 ॥ महाप्रभुका (1) श्रीकृष्ण, (2) श्रीराधा, (3) रस और (4) प्रेमके स्वरूप-तत्त्वका वर्णन करनेके लिये श्रीरायसे अनुरोध :- 'कृष्णेर-स्वरूप' कह 'राधार स्वरूप'। 'रस' - कोन् तत्त्व, 'प्रेम' - कोन् तत्त्वरूप ॥ 118 ॥ कृपा करि' एइ तत्त्व कह त' आमारे। तोमा-बिना केह इहा निरूपिते नारे ॥” 119॥ अनुवाद—श्रीकृष्णका स्वरूप क्या है? इसे बताइये, श्रीराधाजीका स्वरूप भी कहिये, रसतत्त्व क्या है और प्रेमतत्त्वका स्वरूप क्या है? कृपा करके इन सब तत्त्वोंको मुझे बतलाइये, आपके अतिरिक्त इन तत्त्वोंका कोई भी निरूपण नहीं कर सकता॥”118-119 ॥ श्रीरायका अपनेको 'यन्त्र' और महाप्रभुको 'यन्त्री'-ज्ञान :- राय कहे, —“इहा आमि किछुइ ना जानि। तुमि येइ कहाओ, सेइ कहि वाणी ॥ 120 ॥ तोमार शिक्षाय पड़ि येन शुक-पाठ। साक्षात् ईश्वर तुमि, के बुझे तोमार नाट ॥ 121 ॥ हृदये प्रेरण कर, जिह्वाय कहाओ वाणी। कि कहिये भाल-मन्द, किछुइ ना जानि ॥”122 ॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द रायने कहा, —“मैं इस विषयमें कुछ भी नहीं जानता हूँ। आप मुझसे जो कहलवाते हैं, मैं वही कह रहा हूँ। तोतेकी भाँति आपके द्वारा सिखाये गये विषयोंका ही पाठ कर रहा हूँ। आप तो साक्षात् ईश्वर हैं, आपके नाटकको भला कौन जान सकता है? भला है या बुरा है- मैं कुछ भी नहीं जानता, अन्तर्यामी रूपसे आप हृदयमें जो प्रेरणा करते हो, जिह्वासे उसी वाणीको कहलवा देते हो॥ 120-122 ॥ अपनेको 'श्रीकृष्ण-विमुख' और 'दीन' बतलाकर महाप्रभुके द्वारा श्रीरायको छलनेकी चेष्टा :- प्रभु कहे,-“मायावादी आमि त' संन्यासी। भक्तितत्त्व नाहि जानि, मायावादे भासि ॥ 123 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा, —“मैं तो मायावादी संन्यासी हूँ। भक्तितत्त्वको मैं कैसे समझ सकता हूँ? मैं तो सदैव मायावादमें ही डूबा रहता हूँ ॥ 123 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीसार्वभौम और श्रीरामानन्दके वैशिष्ट्य और तारतम्यका वर्णन; श्रीसार्वभौम-ब्राह्मण और मुक्तिदाता; श्रीरामानन्द- श्रीकृष्ण-तत्त्वज्ञ और कीर्तनकारी आचार्य अथवा वैष्णव :- सार्वभौम-सङ्गे मोर मन निर्मल हइल। 'कृष्णभक्ति-तत्त्व कह', ताँहारे पुछिल ॥ 124 ॥ तँहो कहे,—'आमि नाहि जानि कृष्णकथा। सबे रामानन्द जाने, तँहो नाहि एथा ॥' 125 ॥ 'वञ्चक'-लीलाभिनयकारी वैष्णव :- तोमार ठाञि आइलाङ तोमार महिमा शुनिया। तुमि मोरे स्तुति कर 'संन्यासी' जानिया ॥ 126 ॥ अनुवाद- श्रीसार्वभौमके सङ्गसे मेरा मन निर्मल हुआ था, इसलिये मैंने उनसे कृष्णभक्तितत्त्वके विषयमें । 277