श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1187, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंनौवाँ अध्याय कथासार-इस अध्यायमें विद्यानगरसे महाप्रभुका गौतमीगङ्गा, मल्लिकार्जुन, अहोबल-नृसिंह, सिद्धवट, स्कन्दक्षेत्र, त्रिमठ, वृद्धकाशी, बौद्धस्थान, त्रिपति, त्रिमल्ल, पाना-नृसिंह, शिवकाञ्ची, विष्णुकाञ्ची, त्रिकालहस्ती, वृद्धकोल, शियालीभैरवी, कावेरीतट और कुम्भकर्णपालसे होते हुए श्रीरङ्गक्षेत्र जाकर श्रीव्येङ्कट भट्टको सपरिवार कृष्ण-भक्त बनानेका वृत्तान्त है। श्रीरङ्गम्से ऋषभपर्वतपर गये और वहाँ श्रीपरमानन्द पुरी-गोसाईंके साथ मिलन हुआ। श्रीपुरी-गोस्वामीने पुरुषोत्तमकी यात्रा की एवं महाप्रभु सेतुबन्धकी ओर चल दिये। श्रीशैलपर्वतपर ब्राह्मण-ब्राह्मणीके वेशमें रह रहे शिव-दुर्गाके साथ बातचीत की। वहाँसे कामकोष्ठिपुरीको पार करके दक्षिण मथुरामें पहुँचे। वहाँ रामभक्त वैरागी ब्राह्मणके साथ वार्त्तालाप हुआ। बादमें कृतमालामें स्नान करके महेन्द्र-पर्वतपर श्रीपरशुरामके दर्शन किये। वहाँसे महाप्रभु सेतुबन्ध गये, वहाँ उन्होंने धनुस्तीर्थमें स्नान और श्रीरामेश्वरके दर्शन करके कूर्मपुराणके मायासीता-सम्बन्धी पुराने पन्नोंको संग्रह करके पूर्वोक्त रामदास ब्राह्मणको लाकर दिये। उसके बाद पाण्डुदेशमें ताम्रपर्णी, बादमें नयत्रिपदी, चियड़तला, तिलकाञ्ची, गजेन्द्र-मोक्षण, पानागड़ि, चाम्तापुर, श्रीवैकुण्ठ, मलयपर्वत, धनुस्तीर्थ, कन्याकुमारी होकर मल्लार देशमें उन्होंने भट्टथारी लोगोंको देखा। उनके चङ्गुलसे काला-कृष्णदासका उद्धार करके लाये। बादमें पयस्विनीके तटपर 'ब्रह्मसंहिता' (पाँचवाँ अध्याय) संग्रह किया। वहाँसे पयस्विनी, शृङ्गवेर-पुरीमठ, मत्स्यतीर्थ होकर उडुपी गाँवमें मध्वाचार्यके गोपालका दर्शन किया। तत्त्ववादियोंको विचारमें पराजित करके फल्गुतीर्थ, त्रिकूप, पञ्चाप्सरा, सूर्पारक, कोलापुर होकर पाण्डेरपुर पहुँचकर श्रीरङ्गपुरीसे शङ्करारण्यकी सिद्धि प्राप्ति (अप्रकट होने)का संवाद सुना। कृष्णवेण्वाके तटपर वैष्णव-ब्राह्मणोंके समाजसे श्रीबिल्वमङ्गल-विरचित श्रीकृष्णकर्णामृत ग्रन्थका संग्रह किया। वहाँसे ताप्ती, माहिष्मतीपुर, नर्मदा-तट, ऋष्यमूक-पर्वत होकर दण्डकारण्यमें सप्ततालका उद्धार किया। वहाँसे पम्पा-सरोवर, पञ्चवटी, नासिक, ब्रह्मगिरि, गोदावरीके जन्मस्थान कुशावर्त्त आदि बहुतसे तीर्थोंके दर्शन करके विद्यानगरमें पहुँचे। विद्यानगरसे पूर्व दिशावाले मार्गसे आलालनाथके दर्शन करके श्रीक्षेत्रमें लौटे। -(अमृतप्रवाहभाष्य) अवैष्णवमतग्रस्त दक्षिण देशवासियोंका उद्धार करनेवाले श्रीगौरहरि :- नानामतग्राहग्रस्तान् दाक्षिणात्यजनद्विपान्। कृपारिणा विमुच्यैतान् गौरश्चक्रे स वैष्णवान्॥ १॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ १॥ अमृतप्रवाह भाष्य-बौद्ध-जैन-मायावादी आदि अनेक प्रकारके मतरूपी मगरमच्छोंसे ग्रस्त गजेन्द्र-स्थानीय दक्षिण भारतवासियोंको कृपारूपी चक्रके द्वारा श्रीगौरचन्द्रने उद्धार करके वैष्णव बनाया था॥ १॥ अनुभाष्य- सः गौरः नानामतग्राहग्रस्तान् (नानामतानि एव ग्राहाः नक्रकुम्भीरमकराः तैः ग्रस्तान् कवलितान्) दाक्षिणात्यजनद्विपान् (दाक्षिणात्यजनाः एव द्विपाः हस्तिनः तान्) कृपारिणा (कृपा-चक्रेण) [तेभ्यः] विमुच्य (अवैष्णवमतवादात् उद्धृत्य) एतान् वैष्णवान् (कृष्ण-पूजारतान्) चक्रे। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ १॥ जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द॥ २॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो, । 339