भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1252, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1252

दसवाँ अध्याय कथासार-महाप्रभुने जब दक्षिण भारतकी यात्राके लिये गये, तब उनके विषयमें श्रीसार्वभौमके साथ राजा प्रतापरुद्रकी बहुत बातचीत हुई। राजाने महाप्रभुके दर्शन करनेकी अभिलाषा प्रकट की। तब श्रीसार्वभौमने कहा था कि महाप्रभुके लौटकर आनेपर वे उनके साथ किसी प्रकारसे साक्षात्कार करा देंगे। महाप्रभु लौटकर आनेके बाद काशीमिश्रके घरमें रहने लगे। श्रीसार्वभौमने श्रीमहाप्रभुके साथ क्षेत्रवासी वैष्णवोंका परिचय करा दिया। श्रीरामानन्द रायके पिता श्रीभवानन्द रायने अपने पुत्र श्रीवाणीनाथ पट्टनायकको महाप्रभुको सौंप दिया। जब महाप्रभुने काला कृष्णदासके भट्टथारिसे मिलनके दोषको व्यक्त करके उसे विदायी देनेका प्रस्ताव रखा, तब श्रीनित्यानन्द प्रभु और अन्यान्य भक्तोंने युक्ति करके, उसके द्वारा श्रीनवद्वीपमें एवं गौड़देशमें सर्वत्र महाप्रभुके लौट आनेका संवाद भिजवाया। नवद्वीपादि स्थानोंपर संवाद पहुँचनेपर भक्त लोग महाप्रभुके दर्शनके लिये आनेके लिये तैयारी करने लगे। इसी समय श्रीपरमानन्दपुरीने नदीया-नगरमें आकर जब महाप्रभुके नीलाचलमें पहुँचनेका संवाद श्रवण किया, तब वे ब्राह्मण कमलाकान्तको साथ लेकर पुरुषोत्तम क्षेत्रमें महाप्रभुके पास पहुँचे। नवद्वीपवासी पुरुषोत्तम भट्टाचार्य वाराणसीमें 'चैतन्यानन्द' नामक गुरुसे संन्यास ग्रहण करके 'स्वरूप' नाम ग्रहण करके नीलाचलमें महाप्रभुके चरणोंमें उपस्थित हुए। श्रीईश्वरपुरीके अप्रकट होनेके बाद उनके सेवक 'गोविन्द' उनकी आज्ञासे महाप्रभुके पास आये। केशव-भारतीके सम्पर्कसे ब्रह्मानन्द-भारती महाप्रभुके पूजनीय थे; उनके उपस्थित होनेपर महाप्रभुने कृपा करके उनका चर्म्माम्बर (चमड़ेका वस्त्र) छुड़वाया। महाप्रभुके प्रभावसे ब्रह्मानन्दने महाप्रभुके माहात्म्यको जानकर उन्हें 'कृष्ण' मानकर स्वीकार किया। जब श्रीसार्वभौमने महाप्रभुको 'कृष्ण' कहकर निर्देश किया, तब महाप्रभुने उनकी बातको 'अतिस्तुति' कहकर उस बातका अनादर किया। (इसी बीच एकदिन) काशीश्वर गोस्वामी आकर उपस्थित हुए। इस अध्यायमें, समुद्रमें नद-नदी-मिलनकी भाँति महाप्रभुके साथ बहुतसे देशोंके भक्तोंके मिलनका वर्णन हुआ है। —(अमृतप्रवाहभाष्य) भक्तोंके जीवनधन श्रीगौरको प्रणाम :— तं वन्दे गौरजलदं स्वस्य यो दर्शनामृतैः। विच्छेदावग्रम्लान-भक्तशस्यान्यजीवयत् ॥ 1 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 1 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जिन्होंने अपने दर्शनामृत-वर्षणके द्वारा विच्छेदरूप अकालके द्वारा मुरझाये हुए भक्तरूपी धान्योंको जीवित किया था, उन गौररूप मेघकी मैं वन्दना करता हूँ॥ 1 ॥ अनुभाष्य— यः (श्रीकृष्णचैतन्यदेवः) स्वस्य (निजश्रीमूर्त्तेः) दर्शना- मृतैः (निजदर्शनान्येव अमृ़तानि पीयूषाणि तैः) विच्छेदावग्रम्लानभक्तशस्यानि (विच्छेदः अनुपस्थितिजन्य-विरहः एव अवग्रहः वर्षणाभावः तेन म्लानानि भक्तरूप-शस्यानि) अजीवयत् (प्राणदानेन रक्षयामास) तं गौरजलदं (श्रीचैतन्यमेघम्) अहं वन्दे। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष देखें ॥ 1 ॥ जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द ॥ 2 ॥ अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो। श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो, समस्त श्रीगौरभक्तवृन्दकी जय हो ॥ 2 ॥ । 405