भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1275

[ 10/174-177 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला पराजयका कारण स्वीकार नहीं किया; उन्होंने कहा कि उसका एक और कारण है। वह यह है कि भगवान् भक्तके सामने अपनी पराजय स्वीकार करते हैं, —यही भगवत्ताका स्वभाव है; जैसे भीष्मवाक्य (भा: 1/9/34)— “स्वनिगममपहाय मत्प्रतिज्ञामृतमधिकर्तुमवप्लुतो रथस्थः। धृतरथचरणोऽभ्ययाच्चलद्गुर्हरिरिव हन्तुमिभं गतोत्तरीयः ॥ ” अर्थात् “श्रीभीष्मदेवने कहा, — 'कुरुक्षेत्र-युद्धमें मैं अस्त्र धारण नहीं करूँगा' - अपनी यह प्रतिज्ञा त्यागकर श्रीकृष्ण मेरी उनसे अस्त्र धारण करवानेकी प्रतिज्ञाको सत्य करनेके लिये रथसे उतरकर चक्र धारणकर मेरा वध करनेके लिये दौड़े थे, जिसमें उनका ऊपरका वस्त्र भी गिर गया था॥” 174 ॥ महाप्रभुकी अलौकिक महिमाका वर्णन,—श्रीभारतीका निर्विशेष-विचार चिद्विलासमें परिवर्तित :— आजन्म करिनु मुञि 'निराकार'-ध्यान। तोमा देखि' 'कृष्ण' हैल मोर विद्यमान ॥ 175 ॥ महाप्रभुकी कृपासे श्रीभारतीको कृष्णभक्तिकी प्राप्ति :— कृष्णनाम स्फुरे मुखे, मने नेत्रे कृष्ण। तोमाके तद्रूप देखि' हृदय—सतृष्ण ॥ 176 ॥ श्रीबिल्वमङ्गलके साथ तुलना :— बिल्वमङ्गल कैल यैछे दशा आपनार। इँह देखि' सेइ दशा हइल आमार ॥” 177 ॥ अनुवाद—मैंने जन्मसे ही निराकारका ध्यान किया है, परन्तु आपके दर्शन करके मुझे ऐसा लगता है कि श्रीकृष्ण साक्षात् मेरे सामने हैं। मेरे मुखसे श्रीकृष्णनाम स्फुरित हो रहा है, मेरे मनमें और नेत्रोंसे श्रीकृष्णके दर्शन हो रहे हैं और मैं आपको श्रीकृष्णरूपमें देख रहा हूँ और आपकी सेवा करनेकी तृष्णा हो रही है। निराकारका ध्यान छोड़कर साकारकी अनुभूतिसे जैसी दशा बिल्वमङ्गल ठाकुरकी हुई थी, मैं देख रहा हूँ कि मेरी भी वैसी ही दशा हो गयी है ॥ 175-177 ॥ अनुभाष्य—मैं सारा जीवन निराकार-ब्रह्मका ध्यान ही करता था, परन्तु आपके साक्षात्कारके फलस्वरूप अप्राकृत श्रीकृष्णमूर्ति मेरे सामने उदित हुई है। मेरे मुखमें और मनमें श्रीकृष्णनाम स्फुरित हो रहा है एवं नेत्रोंसे श्रीकृष्णके दर्शन हो रहे हैं। फिर, आपमें श्रीकृष्णरूप दर्शन करके हृदयमें भी सेवाकी तृष्णा जाग्रत हुई है। ठाकुर बिल्वमङ्गल पूर्व जीवनमें अद्वैतवादी निराकार-ब्रह्म-ध्यानपरायण थे और बादमें श्रीकृष्णभक्त होकर उन्होंने अपनी यह बात कही है, मेरी भी आज वही दशा हुई है। श्रीचैतन्यचन्द्रामृतमें,— “कैवल्यं नरकायते ××× यत्कारुण्यकटाक्षवैभववतां तं गौरमेव स्तुमः”, “धिक् कुर्वन्ति च ब्रह्मयोगविदुषस्तं गौरचन्द्रं नुमः”; “तावद् ब्रह्मकथा विमुक्तपदवी तावन्न तिक्तीभवेत्तावच्चापि विशृङ्खलत्वमयते नो लोकवेदस्थितिः । तावच्छास्त्रविदां मिथः कलकलो नाना-बहिर्वर्त्मसु श्रीचैतन्यपदाम्बुजप्रियजनो यावन्न दृग्गोचरः”॥ “गौरश्चौरः सकलमहरत् कोऽपि मे तीव्रवीर्यः ॥” अर्थात् “'जिनकी कृपाकटाक्ष-सम्पत्तिसे सम्पत्तिशाली उन गौरभक्तोंको केवलारूपा मुक्ति नरकतुल्य प्रतीत होती है, उन श्रीगौरसुन्दरका मैं स्तव करता हूँ।' 'जिनके चरणकमलोंसे क्षरित उज्ज्वल प्रेमानन्दमय अद्भुत अमृतरस पान करके ब्रह्मज्ञानी और अष्टाङ्ग-योगियोंको धिक्कार करता हूँ, उन श्रीगौरहरिकी मैं वन्दना करता हूँ।' 'उस समय तक ही निर्विशेष-ब्रह्म-आलोचना चलती रहती है, उस समय तक ही ईश्वर-सायुज्यादि मुक्तिमार्ग कड़वा नहीं लगता, उस समय तक ही लौकिक और वैदिक कर्मकाण्ड सभी विशृङ्खलताको प्राप्त न हों (अर्थात् सुन्दररूपसे सम्पन्न होते रहें), उस समय तक ही नाना बहिर्मुख मार्गमें दौड़ते हुए पण्डित-मान्यगणोंका परस्पर वाद-विवाद होता रहता है, जिस समय तक श्रीचैतन्यचरणकमल-प्रिय गौरभक्तगण दृष्टिगोचर नहीं होते।' 'कोई एक अमित प्रभावशाली गौरविग्रहधारी चोर मेरे सभी (कुण्ठा-स्वभावका) अपहरण कर रहा है।'॥” 175-177 ॥ 428 ।