श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1290, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 11/78-88 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला प्रणाम किया। श्रीअद्वैताचार्य श्रीगोविन्दको नहीं पहचानते थे, इसलिये उनके बारेमें श्रीस्वरूप दामोदरसे पूछा। श्रीस्वरूप दामोदरने कहा, — “इनका नाम 'गोविन्द' है। ये श्रीईश्वरपुरीके सेवक थे और बहुत गुणवान् हैं। श्रीईश्वरपुरीने इन्हें महाप्रभुकी सेवा करनेके लिये आदेश दिया था, इसलिये महाप्रभुने इन्हें अपने पास रख लिया है॥” 78-81॥ श्रीअद्वैताचार्यको देखकर राजाका कौतूहल :- राजा कहे, — “याँरे माला दिल दुइजन। आश्चर्य तेज, बड़ महान्त, — कह कोन् जन?” ॥ 82 ॥ अनुवाद—राजा प्रतापरुद्रने कहा, — “जिन्हें श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीगोविन्दने माला पहनायी है, उनके तेजको देखकर बड़ा आश्चर्य हो रहा है, वे अवश्य ही बड़े महापुरुष होंगे। कृपा करके बतलाइये कि वे कौन हैं?” ॥ 82 ॥ (3) श्रीअद्वैताचार्यका परिचय देना :- आचार्य कहे, — “इँहार नाम अद्वैत आचार्य। महाप्रभुर मान्यपात्र, सर्व-शिरोधार्य ॥ 83 ॥ अनुवाद—श्रीगोपीनाथाचार्यने कहा, — “इनका नाम श्रीअद्वैताचार्य है। ये महाप्रभुके भी आदरणीय और अन्यान्य सभी भक्तोंमें सर्वश्रेष्ठ हैं॥” 83 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य — 'आचार्य कहे'—श्रीगोपीनाथाचार्यने कहा ॥ 83 ॥ (4) श्रीवास, (5) श्रीवक्रेश्वर, (6) श्रीविद्यानिधि, (7) श्रीगदाधर :- श्रीवास-पण्डित इँह, पण्डित-वक्रेश्वर। विद्यानिधि-आचार्य, इँह पण्डित-गदाधर ॥ 84 ॥ अनुवाद—ये श्रीवास पण्डित, श्रीवक्रेश्वर पण्डित, और श्रीविद्यानिधि आचार्य हैं तथा ये श्रीगदाधर पण्डित हैं॥ 84 ॥ अनुभाष्य — 'विद्यानिधि आचार्य' (आचार्य निधि) — पुण्डरीक विद्यानिधि; आदिलीला 10/14 संख्याका अनुभाष्य और वैष्णव-मञ्जूषा-समाहृति-(प्रथम संख्या) देखें ॥ 84 ॥ (8) श्रीचन्द्रशेखर, (9) श्रीपुरन्दर, (10) श्रीगङ्गादास, (11) श्रीशङ्कर :- आचार्यरत्न इँह, पण्डित-पुरन्दर । गङ्गादास पण्डित इँह, पण्डित-शङ्कर ॥ 85 ॥ अनुवाद—ये श्रीआचार्य रत्न, श्रीपुरन्दर पण्डित, ये श्रीगङ्गादास पण्डित और श्रीशङ्कर पण्डित हैं॥ 85 ॥ (12) श्रीमुरारि, (13) श्रीनारायण, (14) श्रीहरिदास ठाकुर :- एइ मुरारि गुप्त, इँह पण्डित-नारायण। हरिदास ठाकुर इँह भुवनपावन ॥ 86 ॥ अनुवाद—ये श्रीमुरारि गुप्त हैं, ये श्रीनारायण पण्डित और ये ब्रह्माण्डको पवित्र करनेवाले श्रीहरिदास ठाकुर हैं॥ 86 ॥ (15) श्रीहरिभट्ट, (16) श्रीनृसिंहानन्द, (17) श्रीवासुदेव दत्त, (18) श्रीसेन शिवानन्द :- एइ हरि-भट्ट, एइ श्रीनृसिंहानन्द। एइ वासुदेव दत्त, एइ शिवानन्द ॥ 87 ॥ अनुवाद—ये श्रीहरि भट्ट हैं, ये श्रीनृसिंहानन्द हैं, ये श्रीवासुदेव दत्त और ये श्रीशिवानन्द सेन हैं॥ 87 ॥ (19) श्रीगोविन्द, (20) श्रीमाधव, (21) श्रीवासुघोष :- गोविन्द, माधव घोष, एइ वासुघोष। तिन भाइर कीर्तने प्रभु पायेन सन्तोष ॥ 88 ॥ अनुवाद—ये श्रीगोविन्द, श्रीमाधव घोष और श्रीवासुघोष-तीन भाई हैं। इन तीनों भाइयोंका कीर्तन सुनकर महाप्रभुको बहुत आनन्द होता है॥ 88 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य — 'गोविन्द घोष' — उत्तर-राढ़देशके कायस्थ कुलमें प्रकटित हुए थे; इन्हें ही 'घोषठाकुर' 444 ।