भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1348, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1348

[ 13/56-62 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला यह देखकर राजाको आश्चर्य :- प्रतापरुद्रेर हैल परम विस्मय। देखिते शरीर याँर हैल प्रेममय ॥ 56 ॥ श्रीकाशीमिश्रके समक्ष उस रहस्यका प्रकाश :- काशीमिश्रे कहे राजा प्रभुर महिमा। काशीमिश्र कहे,—'तोमार भाग्येर नाहि सीमा ॥ '57 ॥ अनुवाद-[महाप्रभुको सातों मण्डलियोंमें एक साथ देखकर] राजा प्रतापरुद्रको बहुत आश्चर्य हुआ और उनका शरीर श्रीकृष्ण-प्रेममय हो गया। राजा प्रतापरुद्रने श्रीकाशीमिश्रको महाप्रभुके एक साथ सात रूप धारण करनेकी महिमा बतलायी। श्रीकाशीमिश्रने कहा,—हे राजन्! आपके सौभाग्यकी तो सीमा नहीं है॥ '56-57 ॥ अनुवाद—राजा प्रतापरुद्रके द्वारा की गयी तुच्छ सेवाको देखकर महाप्रभु प्रसन्न हो गये थे, इसलिये उनकी कृपासे ही राजा उनके रहस्योंका दर्शन कर सके॥ 60 ॥ अनुभाष्य—'रहस्य-दर्शन'- श्रीजगन्नाथदेवने महाप्रभुके नृत्य-गीतादिके दर्शनसे विस्मित होकर अपने रथको स्थगित कर दिया। महाप्रभुने भी उनके सामने नृत्यादिके द्वारा श्रीजगन्नाथको आनन्द प्रदान किया। 'द्रष्टा' (श्रीजगन्नाथ) और 'दृश्य' (महाप्रभु)के यहाँ एक वस्तु होनेपर भी लीलाकी विचित्रताके कारण इस अद्भुत रहस्यका प्रकाश हुआ और महाप्रभुकी कृपासे राजा इसे समझ सके। सात-मण्डलियोंमें महाप्रभुकी एक साथ उपस्थिति भी जो रहस्योंमें एक और है, राजाने उसकी भी उपलब्धि की ॥ 60 ॥ श्रीसार्वभौमके साथ राजाका मूक सङ्केत :- सार्वभौम-सङ्गे राजा करे ठाराठारि। आर केह नाहि जाने चैतन्येर चुरि ॥ 58 ॥ कृपासे ही उनकी उपलब्धि, तर्कपन्थासे वे ब्रह्माके लिये भी अज्ञेय :- याँरे ताँर कृपा, सेइ जानिबारे पारे। कृपा बिना ब्रह्मादिक जानिबारे नारे ॥ 59 ॥ अनुवाद-राजा प्रतापरुद्र श्रीसार्वभौमको महाप्रभुकी इस लीलाको इङ्गित करने लगे। इन दोनोंके अतिरिक्त और कोई भी महाप्रभुकी इस लीलाको न जान सका। जिसपर महाप्रभुकी कृपा है, वही उन्हें जान सकता है। महाप्रभुकी कृपाके बिना ब्रह्मादि भी उन्हें नहीं जान सकते ॥ 58-59 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 6/82, 84, 86, 87, 89-91 संख्या देखें ॥ 59 ॥ राजाके प्रति सामनेसे वैराग्य, पीछेसे कृपा :- साक्षाते ना देय देखा, परोक्षे त' दया। के बुझिते पारे चैतन्यचन्द्रेर माया ॥ 61 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने राजाको साक्षात् दर्शन नहीं दिये, परन्तु परोक्ष रूपमें उनपर कृपा की। श्रीचैतन्यचन्द्रकी योगमायाको कौन जान सकता है ॥ 61 ॥ अनुभाष्य-प्रत्यक्षरूपमें आचार्यकी लीलाका अभिनय करनेवाले महाप्रभुकी 'राजा'-नामके प्रति बहुत घृणा थी, किन्तु परोक्षरूपसे उनके प्रति इतनी कृपा थी कि, राजा महाप्रभुकी कृपासे उनकी गूढ़लीलाके रहस्य तकको भी भेद करनेमें समर्थ हुए। वास्तवमें महाप्रभुकी यह कृपा और वञ्चना-लीला अर्थात् एक ही साथ उनकी ईश्वरकी और जीवके जैसी लीलाके तात्पर्यको उनके ऐकान्तिक भक्तोंके अतिरिक्त और कोई भी समझनेमें समर्थ नहीं है॥ 61 ॥ राजाकी दीन-सेवाके दर्शनसे महाप्रभुको सन्तोष :- राजार तुच्छ सेवा देखि' प्रभुर तुष्ट मन। सेइ त' प्रसादे पाइल 'रहस्य-दर्शन' ॥ 60 ॥ श्रीभट्ट और श्रीमिश्रको यह देखकर आश्चर्य :- सार्वभौम, काशीमिश्र, —दुइ महाशय। राजारे प्रसाद देखि' हइला विस्मय ॥ 62 ॥ 504 ।