भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1350, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1350

[ 13/69-78 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला आगे शुन जगन्नाथेर गुण्डिचा-गमन। तार आगे प्रभु यैछे करिला नर्त्तन ॥ 70 ॥ एइमत कीर्त्तन प्रभु करिल कतक्षण। आपन-उद्योगे नाचाइल भक्तगण ॥ 71 ॥ अनुवाद-इस प्रकार श्रीजगन्नाथके द्वारा रथपर चढ़े और उनके आगे महाप्रभुने भक्तोंको नृत्य करवाया। अब श्रीजगन्नाथके गुण्डिचा मन्दिरकी ओर जानेका वृत्तान्त सुनो जब महाप्रभुने रथके आगे नृत्य किया था। इस प्रकार महाप्रभुने कुछ समय तक कीर्तन किया और अपने प्रयाससे सभी भक्तोंको नृत्य करनेके लिये प्रेरित किया ॥ 69-71 ॥ महाप्रभुकी नृत्य करनेकी इच्छासे नौ भक्तोंके साथ स्वरूपके कीर्तनदलका गठन :- आपनि नाचिते यबे प्रभुर मन हैल। सात सम्प्रदाय तबे एकत्र करिल ॥ 72 ॥ अनुवाद-जब महाप्रभुकी स्वयं नृत्य करनेकी इच्छा हुई, तब उन्होंने सातों मण्डलियोंको एकत्र कर लिया ॥ 72 ॥ श्रीवास, रामाइ, रघु, गोविन्द, मुकुन्द। हरिदास, गोविन्दानन्द, माधव, गोविन्द ॥ 73 ॥ उद्धण्ड-नृत्ये प्रभुर यबे हैल मन। स्वरूपेर सङ्गे दिल एइ नव जन ॥ 74 ॥ अनुवाद-जब महाप्रभुकी उद्धण्ड (बहुत उछल-कूदकर) नृत्य करनेकी इच्छा हुई, तब उन्होंने श्रीस्वरूप दामोदरके साथ गान करनेके लिये श्रीवास, श्रीरामाइ, श्रीरघु, श्रीगोविन्द, श्रीमुकुन्द, श्रीहरिदास, श्रीगोविन्दानन्द, श्रीमाधव तथा श्रीगोविन्द-इन नौ भक्तोंको दे दिया ॥ 73-74 ॥ अन्यान्य भक्तोंके द्वारा चारों ओर कीर्तन :- एइ दश जन प्रभुर सङ्गे गाय, धाय। आर सब सम्प्रदाय चारिदिके गाय ॥ 75 ॥ अनुवाद-श्रीस्वरूप दामोदरादि ये दस भक्त महाप्रभुके नृत्यमें गान करते हुए उनके साथ भाग भी रहे थे। चारों ओरसे सभी मण्डलियोंमें अन्यान्य भक्त भी गान कर रहे थे ॥ 75 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीजगन्नाथकी स्तुति :- दण्डवत् करि, प्रभु जुड़ि' दुइ हात। ऊर्ध्वमुखे स्तुति करे देखि' जगन्नाथ ॥ 76 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने श्रीजगन्नाथको दण्डवत् प्रणाम किया और फिर उठकर अपने दोनों हाथोंको जोड़कर उनको देखते हुए उनकी स्तुति करने लगे ॥ 76 ॥ विष्णुपुराण (1/19/65)- नमो ब्रह्मण्यदेवाय गोब्राह्मणहिताय च। जगद्धिताय कृष्णाय गोविन्दाय नमो नमः ॥ 77 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 77 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-ब्रह्मण्यदेव, गो-ब्राह्मणके हितस्वरूप, जगत्के मङ्गलस्वरूप, श्रीकृष्णस्वरूप और श्रीगोविन्दस्वरूप, उन परमतत्त्वको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ 77 ॥ अनुभाष्य- गोब्राह्मणहिताय (गवादिसर्वमङ्गलाकरवस्तूनां शुभानुध्यायिने) ब्रह्मण्यदेवाय (ब्राह्मण्यानाम् उपास्याय) जगद्धिताय (लोककल्याणनिवासाय), गोविन्दाय कृष्णाय नमः नमः नमः (असकृत् प्रणतिः)। श्लोक-भावानुवाद-ब्राह्मणोंके उपास्य, गो-ब्राह्मण अर्थात् गौ आदि सर्वमङ्गलकारी वस्तुओंके हितस्वरूप, जगत्के मङ्गलस्वरूप, श्रीकृष्णस्वरूप और श्रीगोविन्दस्वरूप, उन परमतत्त्वको मैं बारम्बार प्रणाम करता हूँ ॥ 77 ॥ श्रीकुलशेखर-कृत मुकुन्दमाला-स्तोत्र- जयति जयति देवो देवकीनन्दनोऽसौ जयति जयति कृष्णो वृष्णिवंशप्रदीपः। जयति जयति मेघश्यामलः कोमलाङ्गो जयति जयति पृथ्वीभारनाशो मुकुन्दः ॥ 78 ॥ 506 ।